बुधवार, 26 नवंबर 2025

“मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा: IGI दिल्ली से Phuket Thailand तक”

 “मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा: IGI दिल्ली से Phuket Thailand तक”

 एक सपना जो सालों से पल रहा था

ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं जो हमारे दिल की गहराइयों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। ऐसे पल, जिनकी हम वर्षों तक कल्पना करते हैं, सपने देखते हैं… और जब वह सपना सच होता है, तो दिल की धड़कनें भी जैसे एक नई लय में धड़कने लगती हैं।

मेरे लिए मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा—दिल्ली से फुकेत—ऐसा ही एक सपना था।
यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक सफर था, एक अनुभव था जिसने मुझे दुनिया को एक नई दृष्टि से देखने का मौका दिया।

इस व्लॉग में मैं आपको साथ लेकर चलूँगा—
घर से निकलने की घबराहट, IGI एयरपोर्ट की चमक, इमिग्रेशन का अनुभव, टेकऑफ का रोमांच, बादलों के बीच उड़ते हुए मेरे एहसास, और आखिरकार… थाईलैंड की उस धरती तक, जहाँ पहली बार विदेशी हवा ने मेरा स्वागत किया।

साथ बने रहिए… यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, हर यात्रा प्रेमी की कहानी है जिसे पहली बार आसमान के पार जाने का मौका मिलता है।

सफर की शुरुआत: रात की नमी में दबी उत्सुकता

उस रात मेरी नींद वैसे भी पूरी नहीं हुई थी।
मन में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
“कल मैं अपने जीवन की पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान भरने वाला हूँ।”

मैंने एक बार फिर अपने बैग चेक किए—पासपोर्ट, टिकट, ID, चार्जर, कैमरा, ट्राइपॉड… सब कुछ जैसे परीक्षा देने जा रहा हूँ।

लेकिन दिल के अंदर कहीं न कहीं हल्की सी घबराहट थी।

पहली विदेश यात्रा… और दिल में लाखों सवाल।

सब कुछ समेटकर जैसे ही मैं घर से बाहर निकला, रात की वह ठंडी हवा चेहरे से टकराई।
एक एहसास आया—
“हाँ, अब यह सफर शुरू हो चुका है।”

रास्ते का उत्साह: दिल्ली की सड़कों पर चलती कार

रात के करीब 3 बजे थे।
सड़कों पर ट्रैफिक कम था, लेकिन मेरे मन में भावनाओं का ट्रैफिक भरा पड़ा था।
कार की खिड़की से बाहर देखते हुए ऐसा लगता था जैसे दिल्ली शहर भी मेरे साथ जाग रहा हो।

हर मोड़ पर मन कह रहा था—
“अब बस IGI पहुँच जाऊँ, फिर असली मज़ा शुरू होगा।”

मैंने YouTube पर कई वीडियो देखे थे—
“पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा कैसे करें”,
“इमिग्रेशन में क्या होता है”,
“फ्लाइट टेकऑफ कैसा लगता है”…

लेकिन आज मैं खुद उसे अनुभूत करने वाला था।

Indira Gandhi International Airport का पहला दृश्य

जैसे ही कार IGI के गेट की ओर मुड़ी, सामने जो चमक दिखाई दी, वह दिल में उतर गई।
बड़ा–सा प्रवेश द्वार, लाइटों की चमक, विदेशी टैक्सियाँ, लगेज ट्रॉलियाँ, और अलग-अलग देशों से आए लोग…

पहली बार यह सब देखते हुए मैं कुछ पल के लिए चुप हो गया।
सोचा—
“यही है वह जगह, जहाँ से सपने उड़ान भरते हैं।”

Terminal 3 का विशाल भवन, उसकी काँच की दीवारें, और अंदर दिखाई देता नीला-पीला प्रकाश…
सच कहूँ तो, पहली झलक ही दिल जीत ले गई।

मैंने अपने कैमरे को ऑन किया और व्लॉग रिकॉर्डिंग शुरू की—
"दोस्तों, आज मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा शुरू हो रही है… और मैं पहुँच चुका हूँ IGI एयरपोर्ट दिल्ली। आज मैं जा रहा हूँ फुकेत, थाईलैंड।"

वह वाक्य बोलते समय खुद पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि यह सब सच में हो रहा है।

Terminal 3 का रोमांच

जैसे ही मैं अंदर गया, सामने विशाल हॉल दिखा—
नीचे चमकती टाइल्स, ऊपर लटकी सुनहरी कला-कृतियाँ, और चारों ओर यात्रियों की चहल-पहल।

हर कोई अपने-अपने गंतव्य की ओर जा रहा था—
कोई दुबई, कोई लंदन, कोई न्यूयॉर्क…
और मैं…
Phuket, Thailand ❤️

चेक-इन काउंटर पर पहुँचते ही मेरा दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।
पासपोर्ट पहली बार अंतरराष्ट्रीय काउंटर पर जा रहा था।

“Sir, where are you travelling?”
"Phuket, Thailand," मैंने गर्व से कहा।

उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा पासपोर्ट, टिकट, और बैग चेक किया।
कुछ मिनटों बाद मेरे हाथ में बोर्डिंग पास था।

बोर्डिंग पास हाथ में आने का वह एहसास…
जैसे किसी सैनिक को जीत का प्रतीक मिल गया हो।

मैंने कैमरे की ओर देखते हुए कहा—
“दोस्तों, अब असली सफर शुरू… चलिए चलते हैं इमिग्रेशन की तरफ।”

इमिग्रेशन: सबसे अहम चरण

इमिग्रेशन काउंटर की लंबी लाइन देखते ही थोड़ी घबराहट हुई।
सब लोग शांत खड़े थे, कोई मोबाइल पर बात कर रहा था, कोई कागज़ तैयार कर रहा था।

मैं भी लाइन में लगा।
जब मेरी बारी आई तो अधिकारी ने पूछा—
"Is this your first international trip?"
मैंने मुस्कुराकर कहा, "Yes, sir."

उन्होंने पासपोर्ट देखा, कुछ पल के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर टाइप किया…
और फिर — मुट्ठ की आवाज़ जैसी मुहर की आवाज़
THPP
पासपोर्ट पर पहली विदेशी मुहर लग चुकी थी।

मैंने मन में कहा —
“हाँ! यह हो गया… मैं अब सचमुच इंटरनेशनल ट्रैवलर हूँ।”

कैमरे में मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“दोस्तों, पासपोर्ट पर पहली मुहर लग चुकी है… और यह एहसास बताने लायक नहीं।”

सिक्योरिटी चेक और Departure Gate

अगला चरण था सिक्योरिटी चेक।
सब बहुत तेज़ी से हुआ।

जैसे ही मैं आगे बढ़ा, सामने Duty-Free Shops की चमक दिखाई दी।
परफ्यूम, घड़ियाँ, चॉकलेट्स, लग्जरी ब्रांड्स…

यह सब देखकर अहसास हुआ कि यह जगह हर यात्री के लिए एक छोटा–सा संसार है।

Gate number स्क्रीन पर देखकर मैं अपनी फ्लाइट की ओर बढ़ा।
सामने खड़ी थी—मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान।
वह विमान मानो मुझे बुला रहा था—
“चलो… अब दुनिया बदलने वाली है तुम्हारी।”

विमान में बैठने का जादुई पल

जब बोर्डिंग शुरू हुई, मैं लाइन में खड़ा हुआ।
दरवाजे से अंदर कदम रखते ही एयरहोस्टेस की मुस्कुराहट ने डर को आधा कम कर दिया।

मुझे खिड़की वाली सीट मिली थी—मेरी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई।

मैं बैठा और बाहर देखा—
रनवे की रोशनी, टैक्सी करती गाड़ियाँ, और दूर खड़ी बड़ी-बड़ी फ्लाइट्स…
यह सब मुझे सपने जैसा लग रहा था।

सीट बेल्ट बाँधते ही दिल धड़कने लगा।
यह वही पल था जिसके बारे में मैंने वर्षों से सोचा था।

टेकऑफ: जब धरती पीछे छूटने लगी

फ्लाइट धीरे–धीरे रनवे पर आगे बढ़ने लगी।
एक क्षण ऐसा आया जब उसने रफ्तार पकड़ी—
और अचानक…
आकाश में उड़ान भर ली।

दिल में एक चुभन–सी हुई, आँखें हल्की सी नम हुईं।
नीचे दिल्ली पीछे छूट रही थी—इमारतें छोटी हो रही थीं…
और मेरे सपने बड़े।

जब विमान बादलों को चीरकर ऊँचाई पर पहुँचा, मैंने कैमरा खिड़की की ओर घुमाया—
बाहर रूई जैसे बादल थे, सूरज हल्का नारंगी…
जैसे स्वर्ग नीचे बिछा हो।

मैंने खुद से कहा—
“यह मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत पलों में से एक है।”

आसमान में 4 घंटे: शांति, सौंदर्य, और अनंत आकाश

फ्लाइट में भोजन मिला, मैंने खाया।
कुछ देर बाद फ्लाइट की लाइट्स धीमी हो गईं।

मैंने खिड़की से बाहर देखा—
नीचे बादलों की चादर…

मन में एक ही विचार आया—
“ज़िंदगी में कम से कम एक बार ऐसा सफर जरूर करना चाहिए।”


थाईलैंड का पहला दृश्य:  समंदर

करीब 4 घंटे बाद सामने समुद्र दिखाई दिया।
नीला पानी…
उसके बीच टापू…
और आसमान में सूरज का हल्का सुनहरा रंग…

यह दृश्य देखकर ऐसा लगा मानो किसी ने एक पेंटिंग को जीवन दे दिया हो।

मैंने कैमरे में कहा—
“दोस्तों… स्वागत है थाईलैंड में, यह सब मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

Phuket International Airport की धरती पर पहली बार कदम

जैसे ही विमान उतरा, मैं खिड़की से बाहर देखता ही रह गया।
सामने नारियल के पेड़, साफ़ हवा, और विदेशी माहौल।

जब विमान का दरवाजा खुला और मैंने सीढ़ियाँ उतरीं—
वह हवा…
वह महक…

एक पूरी तरह नई दुनिया का स्वागत थी।

पहली Entry stamp लगवाते समय मेरे चेहरे पर मुस्कान थी।

मैंने मन में कहा—
“यह सिर्फ शुरुआत है…”

Thailand की हवा, चेहरे, और माहौल

एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही मन खुश हो गया—
मस्कुराते लोग, अंग्रेजी–थाई भाषा की आवाजें, समुद्री हवा…

हर चीज अलग थी।
हर चीज खूबसूरत।

इस यात्रा ने मुझे क्या सिखाया?

यह यात्रा सिर्फ घूमने की नहीं थी—
यह जीवन का एक पाठ थी।

मैंने सीखा—
● सपनों को पूरा किया जा सकता है
● दुनिया बहुत बड़ी और खूबसूरत है
● यात्रा हमें बदल देती है
● डर सिर्फ शुरुआती बाधा है
● आकाश की कोई सीमा नहीं—हमारी क्यों हो?

समापन: मेरी कहानी, मेरी यात्रा

यह मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा थी—
दिल्ली से Phuket तक।

और आज जब मैं इस व्लॉग को रिकॉर्ड कर रहा हूँ, मन में बस एक ही बात है—
“सफर जितना बाहर का होता है, उतना ही अंदर का भी।”

आप सबका धन्यवाद,
जो मेरे साथ इस कहानी के हर पल में जुड़े रहे।


रविवार, 2 नवंबर 2025

धोखे की उड़ान – अमित और किंजल की अधूरी दास्तान

 

💔 “धोखे की उड़ान – अमित और किंजल की अधूरी दास्तान”



लखनऊ का रहने वाला अमित मिश्रा, उम्र 29 साल, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है जो पिछले पाँच सालों से बैंगलोर में एक बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी कर रहा है।
अमित एक सरल, इमोशनल और परिवार से गहराई से जुड़ा हुआ इंसान है। ऑफिस में उसकी अपनी एक पहचान है— मेहनती, सच्चा और शांत स्वभाव वाला लड़का।

उसके माता-पिता अब उसकी शादी की बात करने लगे थे। घरवालों को लगता था कि अब बेटा बस जाए।
अमित को भी कोई एतराज़ नहीं था, बस उसकी एक छोटी सी शर्त थी — “जिससे शादी करूँ, उससे दिल से जुड़ाव हो।”


दीपावली आने वाली थी। अमित ने तीन दिन की छुट्टी ली और फ्लाइट से लखनऊ जाने का प्लान बनाया।
फ्लाइट मुंबई से होकर जाती थी — बैंगलोर ✈️ मुंबई ✈️ लखनऊ।

वो सुबह जल्दी एयरपोर्ट पहुँचा। सामान चेक-इन कराया और गेट नंबर 12 पर बैठ गया। मोबाइल में माँ का मैसेज आया —

“बेटा, पहुँचते ही कॉल करना। और हाँ, इस बार एक लड़की दिखाने की बात भी पक्की है। लड़की मुंबई में जॉब करती है, बहुत अच्छी फैमिली है।”

अमित ने मुस्कुराते हुए रिप्लाई किया —

“ठीक है माँ, जैसा आप कहें।”


फ्लाइट ने मुंबई एयरपोर्ट पर टेकऑफ़ से पहले थोड़ी देर के लिए रुकना था। अमित की सीट विंडो वाली थी — 17A
जब यात्रियों की अदला-बदली हो रही थी, तभी एक लड़की आई — हाथ में लैपटॉप बैग, बाल खुले हुए, आँखों में तेज़ और चेहरे पर आत्मविश्वास।
उसका टिकट भी 17A का ही था।

लड़की ने सीट नंबर देखा और बोली —

“Excuse me! यह मेरी सीट है।”

अमित ने मुस्कुराते हुए कहा —

“नहीं, ये मेरी है। देखिए टिकट।”

दोनों ने टिकट दिखाए — और कमाल की बात यह कि दोनों के टिकट पर एक ही सीट नंबर था।

एयर होस्टेस को बुलाया गया, उसने सिस्टम चेक किया और बोली —

“Sir, आपके पास 17A है, और मैडम का 17B। शायद printing mistake हो गई।”

अमित ने हँसते हुए कहा —

“कोई बात नहीं, आप window seat ले लीजिए, मुझे बीच में भी चलेगा।”

लड़की मुस्कुराई —

“Thank you, लेकिन आपको भी तो बाहर देखने का मन होगा!”

अमित बोला —

“मैं रोज़ कोडिंग में इतना बाहर नहीं देख पाता कि अब clouds क्या दिखेंगे!”

दोनों हँस पड़े।


फ्लाइट उड़ान भर चुकी थी। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बातचीत शुरू हुई।
लड़की का नाम किंजल  था — लखनऊ  की रहने वाली, और मुंबई में एक MNC कंपनी में HR के पद पर काम करती थी।

बहुत आत्मनिर्भर, खुशमिज़ाज और खुली सोच वाली लड़की।

बातचीत में धीरे-धीरे अपनापन आने लगा।

अमित: “तो आप लखनऊ क्यों जा रही हैं?”
किंजल (हँसते हुए): “वही वजह जो शायद आपकी भी होगी।”
अमित: “मतलब?”
किंजल: “शादी के लिए लड़का देखने।”

अमित चौक गया —

“अरे! सच में? मैं भी तो अपनी शादी के लिए जा रहा हूँ!”

दोनों हँस पड़े।
फ्लाइट की सीट अब एक कहानी की शुरुआत बन चुकी थी।


फ्लाइट लखनऊ लैंड कर चुकी थी। दोनों ने एक-दूसरे को मुस्कुराकर अलविदा कहा।

अमित: “Good luck for your meeting.”
किंजल: “Same to you, Mr. Software Engineer.”

अमित घर पहुँचा तो माँ ने बताया कि दो दिन बाद “लड़की देखने” का प्रोग्राम है।
अमित ने पूछा — “कहाँ?”
माँ ने जवाब दिया — “अलीगंज में, लड़की का नाम किंजल है।”

अमित के होंठों पर मुस्कान थी —

“किंजल… कहीं वही तो नहीं?”


रविवार की सुबह थी। अमित अपने माता-पिता के साथ तय पते पर पहुँचा।
दरवाज़ा खुला — और सामने वही चेहरा!
किंजल, वही जो फ्लाइट में मिली थी, वही मुस्कान, वही आँखें।

दोनों कुछ पल के लिए हैरान रह गए।
किंजल की माँ बोली — “अरे, आप दोनों पहले से एक-दूसरे को जानते हैं क्या?”

अमित ने हल्की हँसी में कहा —

“जी, हमारी मुलाक़ात आसमान में हुई थी।”

कमरे में सब हँस पड़े।


दोनों को अकेले में बात करने का मौका दिया गया।
अमित ने कहा —

“कभी सोचा नहीं था कि फ्लाइट में मिली लड़की मेरी शादी की लिस्ट में होगी।”

किंजल ने जवाब दिया —

“किस्मत भी कभी-कभी बहुत क्रिएटिव होती है।”

दोनों ने बातें कीं — पसंद, करियर, सोच, परिवार।
सब कुछ सामान्य और सहज लगा।

किंजल: “शादी एक ज़िम्मेदारी है, मैं चाहती हूँ कि हम एक-दूसरे को थोड़ा समय दें।”
अमित: “मुझे भी जल्दी नहीं है, मैं समझता हूँ प्यार को पनपने का समय देना चाहिए।”

परिवार वाले भी खुश थे। सबने तय किया —

“छह महीने तक एक-दूसरे को समझिए, फिर फैसला कीजिए।”


आने वाले हफ्तों में अमित और किंजल रोज़ बातें करने लगे — कॉल, वीडियो चैट, मैसेज…
किंजल बहुत हँसमुख थी, अमित के दिन अब हँसी से भरे थे।
कभी ऑफिस के बाद वे लंबी कॉल पर अपने-अपने बचपन की कहानियाँ साझा करते।

अमित को लगता था कि उसने अपनी “जीवनसंगिनी” पा ली है।


छह महीने बाद, दोनों परिवारों ने शादी तय कर दी।
शादी लखनऊ के एक बड़े होटल में धूमधाम से हुई।
अमित और किंजल अब पति-पत्नी थे।

पहली रात — सुहागरात — किंजल ने गंभीर होकर कहा —

“अमित, मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ। मुझे थोड़ा समय चाहिए, मैं अभी mentaly ready नहीं हूँ physical relation के लिए। क्या तुम मुझे थोड़ा वक्त दोगे?”

अमित ने धीरे से कहा —

“किंजल, प्यार जबरदस्ती नहीं होता, मैं तुम्हारा इंतज़ार कर सकता हूँ… जितना चाहे उतना।”

किंजल ने राहत की साँस ली और बोली —

“तुम बहुत अच्छे हो अमित।”


शादी को तीन महीने हो चुके थे। सब कुछ ठीक था — या शायद दिखाई दे रहा था।
किंजल का व्यवहार थोड़ा बदलने लगा था। वह अक्सर मोबाइल में बिज़ी रहती, किसी “ऑफिस फ्रेंड” से लंबे चैट करती थी।
अमित ने कई बार पूछा —

“किससे बात कर रही हो?”
किंजल ने मुस्कुराकर टाल दिया — “ऑफिस के प्रोजेक्ट की बात है।”

अमित ने सोचा — शायद सच हो, आखिर वह HR है, लोगों से बात तो करनी ही होती है।

लेकिन अंदर ही अंदर एक शक का बीज अंकुरित हो चुका था।


शादी के चार महीने बीत चुके थे।
अमित अब भी वही पुराना स्नेही पति था, लेकिन किंजल का रवैया बदल चुका था।
वो अक्सर ऑफिस का बहाना बनाकर देर से घर लौटती, कभी-कभी छुट्टी के दिन भी कहती —

“आज मीटिंग है, जाना ज़रूरी है।”

अमित को अजीब लगता, मगर वो शक नहीं करता था।
वो सोचता — “किंजल मॉडर्न लड़की है, शायद काम का दबाव हो।”

लेकिन हर रोज़, हर रात कुछ न कुछ ऐसा होता जो अमित के मन में अनकहे सवाल छोड़ जाता।


एक रात किंजल सोई हुई थी, मोबाइल साइलेंट मोड पर था।
अमित पानी पीने उठा तो मोबाइल पर “Rahul calling…” चमका।
दिल धड़क उठा।
वो कॉल मिस हो गया, लेकिन तुरंत एक मैसेज आया —

“Good night baby 😘, miss you.”

अमित का दिल सन्न रह गया।
वो कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहा, फिर धीरे से रख दिया।
उसने कुछ नहीं कहा, बस तकिये की तरफ़ मुंह फेरकर लेट गया।

उसकी आँखों में अब नींद नहीं थी, बस सवाल थे।


सुबह अमित ने खुद को सामान्य दिखाया।
किंजल किचन में चाय बना रही थी। अमित ने सहज लहजे में पूछा —

“कल रात कोई कॉल आया था तुम्हारे मोबाइल पर, शायद राहुल?”

किंजल का चेहरा पलभर को सफेद पड़ गया, फिर बोली —

“अरे वो राहुल… ऑफिस का दोस्त है, मजाक में ऐसा बोल देता है।”

अमित ने मुस्कुरा कर कहा —

“ठीक है, मजाक तो अच्छे दोस्त करते ही हैं।”

लेकिन भीतर कुछ टूट चुका था।


अब अमित चुपके से किंजल को observe करने लगा।
वो देखता कि जब भी राहुल का नाम मोबाइल पर आता, किंजल थोड़ा घबरा जाती।
कभी मुस्कुरा कर मोबाइल छिपा लेती, कभी तुरंत स्क्रीन बंद कर देती।

एक रात उसने तय किया कि अब सच्चाई जाननी ही होगी।
किंजल के सो जाने के बाद उसने मोबाइल अनलॉक किया।

वहाँ व्हाट्सएप चैट में पढ़ा —

राहुल: “अब कब तक उसे मूर्ख बनाए रखोगी?”
किंजल: “बस थोड़ा और समय दो, फिर सब आसान होगा।”
राहुल: “याद है, हमारा प्लान? एक natural तरीका चुनना होगा।”
किंजल: “हाँ, मैं तैयार हूँ, बस सही वक्त का इंतज़ार है।”

अमित के हाथ काँपने लगे।
उसने आगे स्क्रॉल किया — पुरानी तस्वीरें, दिल वाले इमोजी, और ऐसे मेसेज जो सब कुछ कह रहे थे।

“काश हमारे घरवाले समझ पाते।”
“अब जब तुम उसकी हो, तो जल्दी खत्म करो ये नाटक।”

अमित की आँखों में आँसू आ गए।
वो धीरे से उठकर बालकनी में चला गया।
रात के तीन बजे का सन्नाटा था, लेकिन उसके भीतर तूफान मच चुका था।


अगले दिन अमित ने तय किया कि वो कुछ कहेगा नहीं — बस सब कुछ जानने की कोशिश करेगा।
उसने  एक दोस्त प्राइवेट डिटेक्टिव मनीष से मदद ली।
मनीष साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट भी था।
अमित ने कहा —

“मुझे बस ये जानना है कि ये राहुल कौन है, कहाँ काम करता है, और मेरी पत्नी से उसका क्या रिश्ता है।”

मनीष ने कहा —

“ठीक है, दो दिन का वक्त दो।”

दो दिन बाद मनीष ने अमित को एक रिपोर्ट दी।
रिपोर्ट पढ़कर अमित का सिर घूम गया —

“राहुल सिंह – मुंबई निवासी, बेरोजगार। चार साल पहले किंजल के साथ रिलेशन में था। किंजल के घरवालों ने रिश्ता तोड़ दिया क्योंकि राहुल काम नहीं करता था। लेकिन दोनों अब भी गुपचुप कॉन्टैक्ट में हैं।”


अमित अब समझ चुका था कि जिस लड़की को उसने इतना सम्मान, समय और प्यार दिया — वही उसकी पीठ पीछे किसी और के साथ साजिश कर रही है।
वो हर रात सोचता — “क्या मुझसे कोई गलती हुई थी?”

लेकिन जवाब सिर्फ़ एक था — “नहीं… गलती सिर्फ़ भरोसा करने की थी।”


एक दिन अमित के ऑफिस में एक पार्टी थी। उसने सोचा —

“आज किंजल को साथ ले चलता हूँ, शायद माहौल बदल जाए।”

किंजल बहुत खुश दिख रही थी। उसने लाल रंग की ड्रेस पहनी थी, बाल खुले हुए थे।
दोस्तों ने अमित से कहा —

“अरे मिश्रा, आज तो अपनी वाइफ के लिए कुछ गाना सुनाओ!”

अमित मुस्कुराया और गाना शुरू किया —
🎶 “तू मिले दिल खिले… और जीने को क्या चाहिए…” 🎶

सभी तालियाँ बजा रहे थे।
किंजल की आँखों में आँसू आ गए — शायद शर्म, शायद पछतावा, या शायद डर।

पार्टी के बाद दोनों घर लौटे।
अमित ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उस रात उसने दोबारा मोबाइल चेक किया — और पाया कि किंजल ने राहुल को मैसेज किया था —

“वो कुछ समझ गया है, हमें जल्दी कुछ करना होगा।”

अब अमित ने तय कर लिया — “बस अब खेल खत्म।”


अगली सुबह अमित ने खुद को बेहद शांत दिखाया।
उसने किंजल से कहा —

“किंजल, मुझे अब सब पता चल चुका है।”

किंजल के चेहरे का रंग उड़ गया।

“क्या मतलब?”

अमित ने कहा —

“राहुल के बारे में सब जानता हूँ। लेकिन मैं कोई झगड़ा नहीं चाहता। तुम चाहो तो मैं तुम्हें डिवोर्स दे दूँ। आधी प्रॉपर्टी तुम्हारे नाम कर दूँ। बस मुझसे एक आखिरी बार राहुल से मिलवा दो।”

किंजल ने अविश्वास से उसकी तरफ देखा —

“तुम सच में ऐसा करोगे?”
अमित: “हाँ, अगर तुम खुश हो जाओगी तो मुझे कोई ग़म नहीं।”

किंजल ने राहुल को मैसेज किया —

“वो तैयार है, मिलो।”


अगली सुबह  की हवा कुछ अलग थी।
अमित ने तय कर लिया था — आज सब कुछ खत्म होगा, लेकिन अपने तरीके से।
वो अब भी सामान्य दिख रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

किंजल अब भी थोड़ा डरी हुई थी, पर अमित की शांति देखकर उसे लगा कि शायद वो वाकई मान गया है।
वो सोच रही थी —

“शायद सब आसान हो जाएगा। बस एक बार राहुल आ जाए…”


अमित ने  फ्लाइट टिकटें बुक कीं  ।
फिर किंजल से कहा —

“मैं चाहता हूँ कि मैं और राहुल आमने-सामने बैठकर बात करें।
मुझे न कोई बदला चाहिए, न झगड़ा। बस सच्चाई और एक शांत अंत।”

किंजल को भी यही लगा कि अमित की “पागलपंती” अब खत्म हो गई है।
वो तुरंत राज़ी हो गई और राहुल को कॉल किया —

“राहुल, सब ठीक है, अमित मान गया है। वो आधी प्रॉपर्टी देने को तैयार है, बस तुम आ जाओ।”

राहुल ने कहा —

“वाह! आखिर मेरी किंजल जीत गई।”


तीन दिन बाद राहुल बैंगलोर आया।
अमित ने खुद उसे एयरपोर्ट से रिसीव किया।
राहुल ने मुस्कुरा कर कहा —

“भाई, तुम तो बहुत समझदार निकले।”

अमित ने भी हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया —

“समझदारी में ही तो सच्चा इंसान दिखता है।”

दोनों साथ में कार से घर पहुँचे।
किंजल अंदर ही अंदर बेचैन थी।
वो सोच रही थी — “अब सब हमारे नाम हो जाएगा।”


अमित ने अपने स्टडी रूम में बैठकर फाइल खोली।
उसमें बैंक बॉन्ड, प्रॉपर्टी के पेपर, और एक लीगल डीड रखी थी।

अमित: “देखो राहुल, ये दस करोड़ के बॉन्ड हैं, और ये फ्लैट मेरे नाम पर है।
यहाँ मैंने सब पर साइन कर दिए हैं। अब ये तुम्हारे नाम होंगे।”

राहुल की आँखों में लालच चमक उठा।
उसने कहा —

“वाह! भाई, तुम तो दिलदार निकले। इतना पैसा, इतनी प्रॉपर्टी!
मैं तो सोच भी नहीं सकता था।”

किंजल अब भी थोड़ा नर्वस थी।
अमित ने मुस्कुरा कर कहा —

“लेकिन एक छोटी-सी शर्त है।”

राहुल ने कहा —

“बोलो भाई, कैसी शर्त?”

अमित ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा —

“तुम्हें किंजल को छोड़ना होगा।”


राहुल पहले तो हँस पड़ा —

“अरे भाई, मज़ाक मत करो। ये सब तो किंजल की वजह से ही मिला है।”

अमित ने कहा —

“कोई मज़ाक नहीं कर रहा। ये सब तुम्हारे नाम होगा, लेकिन किंजल अब तुम्हारी नहीं रहेगी।”

राहुल कुछ पल चुप रहा, फिर हँसते हुए बोला —

“इतने पैसों के लिए? हाँ भाई, मैं 1 नहीं 10 किंजल छोड़ सकता हूँ!
मुझे ऐसी बहुत मिल जाएँगी।”

ये सुनते ही किंजल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वो काँपती आवाज़ में बोली —

“राहुल… ये क्या कह रहे हो तुम?”

राहुल ने बेशर्मी से कहा —

“अब क्या चाहिए? जो चाहिए था वो मिल गया। अब तुम अपने अमित जी के साथ रहो।”

किंजल की आँखों से आँसू गिरने लगे।
उसने गुस्से में कहा —

“तुम धोखेबाज़ हो राहुल! मैंने तुम्हारे लिए सबकुछ दाँव पर लगा दिया था।”

राहुल ने ठंडे स्वर में कहा —

“तुम्हारी गलती है, बेवकूफी मतलब प्यार नहीं होता।”


तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
दो पुलिसवाले अंदर आए।
अमित ने कहा —

“इंस्पेक्टर साहब, यही है राहुल सिंह।”

राहुल चौक गया —

“ये क्या मज़ाक है?”

इंस्पेक्टर ने कहा —

“हमने तुम्हारी कॉल रिकॉर्डिंग और चैट्स ट्रेस कर ली हैं।
 अमित मिश्रा की हत्या की साजिश का केस तुम्हारे खिलाफ़ दर्ज है।”

राहुल चिल्लाया —

“नहीं! ये झूठ है!”

अमित ने कहा —

“सच का वक्त हमेशा आता है, राहुल।
प्यार धोखे पर नहीं, भरोसे पर टिकता है।”

पुलिस राहुल को हथकड़ी लगाकर ले गई।
किंजल फूट-फूटकर रो रही थी।


किंजल ज़मीन पर बैठी थी।
वो बड़बड़ाई —

“मैंने सब खो दिया… राहुल भी, और तुम भी।”

अमित की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर दृढ़ता थी।
उसने कहा —

“किंजल, मैं तुमसे सच्चा प्यार करता था।
लेकिन अब तुमसे उतनी ही नफ़रत करूँगा जितना पहले प्यार करता था।
तुम मेरे घर में रह सकती हो अगर चाहो,
लेकिन मेरा भरोसा और मेरा दिल अब तुम्हारे लिए कभी नहीं खुलेगा।”

किंजल ने रोते हुए कहा —

“क्या तुम मुझे माफ़ नहीं कर सकते?”

अमित ने गहरी सांस ली —

“माफ़ कर दूँगा… लेकिन भूल नहीं पाऊँगा।”


कुछ महीनों बाद किंजल ने खुद को अमित से अलग कर लिया।
वो मुंबई वापस चली गई, और वहाँ से विदेश नौकरी के लिए निकल गई।

अमित फिर से अपने काम में लौट गया — लेकिन अब उसकी मुस्कान के पीछे एक दर्द था।
वो अक्सर बालकनी में बैठकर आसमान की ओर देखता और सोचता —

“जिस उड़ान में मुलाक़ात हुई थी, वही ज़िंदगी की सबसे बड़ी गिरावट बन गई…”

धीरे-धीरे उसने अपनी ज़िंदगी को सँवारा।
प्यार अब भी उसके दिल में था, लेकिन वो जान चुका था —
“सच्चा प्यार वो नहीं जो साथ दे,
बल्कि वो है जो धोखे के बाद भी किसी को बुरा नहीं चाहता।”


एक साल बाद, लखनऊ के उसी एयरपोर्ट पर, अमित ने फिर एक उड़ान पकड़ी —
लेकिन इस बार बिना किसी उम्मीद, बिना किसी डर के।

उसने अपने मोबाइल में किंजल का पुराना मैसेज देखा —

“Good luck for your meeting.”

अमित मुस्कुरा दिया और खुद से कहा —

“हाँ किंजल, आज भी एक meeting है… अपने अतीत से, अपने आप से।”

फ्लाइट आकाश में उड़ चली।
नीचे शहर की बत्तियाँ चमक रही थीं,
और ऊपर आसमान में सिर्फ़ सन्नाटा था —
जैसे खुद ज़िंदगी कह रही हो —

“कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते,
पर उनकी यादें हमेशा ज़िंदा रहती हैं।”



रविवार, 5 अक्टूबर 2025

❤️ Love Now Days – एक आधुनिक प्रेमकहानी

 


 ❤️ Love Now Days – एक आधुनिक प्रेमकहानी




दिल्ली का ठंडा जनवरी महीना था। मेट्रो स्टेशन पर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। हर किसी के हाथ में मोबाइल था—कोई इंस्टाग्राम स्क्रॉल कर रहा था, कोई रील बना रहा था, तो कोई कॉल पर बिज़ी था। इसी भीड़ में खड़ा था **आरव**, 27 साल का एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर।


आरव की दुनिया बहुत साधारण थी—ऑफिस, घर और कभी-कभार दोस्तों से मिलने का समय। लेकिन मोबाइल की स्क्रीन उसके जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुकी थी। इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, लिंक्डइन—सब जगह वह मौजूद था, मगर असल ज़िंदगी में बेहद अकेला।


एक दिन उसने यूँ ही इंस्टाग्राम पर स्क्रॉल करते हुए देखा कि उसके कॉलेज की एक पुरानी जान-पहचान वाली लड़की, **सिया**, की प्रोफ़ाइल सामने आ गई। सिया अब मुंबई में जर्नलिस्ट थी।


आरव ने सोचा—

*"कितना बदल गई है ये… कॉलेज में तो कितनी चुप रहती थी। अब देखो, कितनी कॉन्फिडेंट और पब्लिक फिगर जैसी लग रही है।"*


उसने हिम्मत करके एक *‘Hi’* भेज दिया। जवाब तुरंत नहीं आया। लेकिन रात को करीब 11 बजे फोन पर नोटिफिकेशन बजा—

**सिया: Hi Aarav, long time! How are you?**


बस, वहीं से कहानी की शुरुआत हुई।



शुरू-शुरू में औपचारिक बातें हुईं—*“कहाँ हो?”, “क्या कर रहे हो?”, “परिवार कैसा है?”*।

लेकिन धीरे-धीरे ये बातें लंबी रातों तक खिंचने लगीं।


सिया अक्सर रात को ऑफिस से लौटकर आरव से बातें करती।

वो कहती—

*"दिनभर न्यूज़, पॉलिटिक्स और ब्रेकिंग स्टोरीज़ में दिमाग उलझा रहता है… लेकिन तुम्हारे साथ चैट करने पर लगता है कोई अपना है।"*


आरव हँसते हुए लिखता—

*"मुझे लगता है कि मैं तुम्हें फिर से जान रहा हूँ… पहले वाली सिया से बिलकुल अलग।"*


आजकल के प्यार की यही शुरुआत होती है—ना तो मोहल्ले की छत पर नज़रें मिलना, ना कॉलेज की कैंटीन में चुपके से बातें करना। बल्कि मोबाइल स्क्रीन और टाइप होते हुए ब्लू टिक ही इशारे बन जाते हैं।



दिन बीतते गए। दोनों की चैट कॉल्स में बदलीं, फिर वीडियो कॉल्स में।

आरव को लगता जैसे अब उसकी ज़िंदगी रंगीन हो गई हो। ऑफिस से लौटकर मोबाइल पर सिया का चेहरा देखना उसकी दिनचर्या का सबसे प्यारा हिस्सा था।


सिया ने एक दिन मज़ाक में कहा—

*"देखो आरव, हमें मिले हुए कितने साल हो गए। लेकिन अब लगता है हम रोज़ साथ रहते हैं।"*


आरव ने हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया—

*"हाँ, पर फर्क बस इतना है कि साथ मोबाइल स्क्रीन में है, हकीकत में नहीं।"*


दोनों के बीच एक अजीब सा खिंचाव था। मगर किसी ने सीधे-सीधे 'प्यार' शब्द नहीं कहा था।


करीब दो महीने बाद, सिया दिल्ली आई।

उसने मज़ाक करते हुए कहा—

*"चलो देखते हैं कि इंस्टाग्राम वाला आरव असल में कैसा दिखता है।"*


आरव बेहद नर्वस था। आजकल के प्यार में मिलने से पहले इंसान हजार बार सोचता है—*“वो मुझे देखकर निराश तो नहीं होगी? क्या असलियत में भी वैसा ही कनेक्शन होगा जैसा ऑनलाइन है?”*


उन्होंने कनॉट प्लेस में मिलने का तय किया।

जब सिया सामने आई—काले कोट में, खुले बालों के साथ—तो आरव कुछ पल के लिए बस देखता ही रह गया।


*"Hi,"* सिया ने मुस्कुराकर कहा।

*"Hi…,"* आरव की आवाज़ हल्की काँप रही थी।


दोनों ने कॉफी पी, घंटों बातें कीं। पुराने कॉलेज की यादें, नए सपने, काम की परेशानियाँ—सब कुछ।

और सबसे खास बात—दोनों ने यह महसूस किया कि स्क्रीन के बाहर भी वही जादू बरकरार है।


लेकिन ज़िंदगी हमेशा इंस्टाग्राम रील्स की तरह आसान नहीं होती।

सिया का करियर मुंबई में था, आरव का दिल्ली में। दोनों ही अपने-अपने परिवार की उम्मीदों से बँधे हुए थे।


सिया कहती—

*"मुझे नहीं पता आरव… ये रिश्ता कहाँ जाएगा। मैं करियर छोड़ नहीं सकती, और तुम भी यहाँ सब छोड़कर आ नहीं सकते।"*


आरव चुप रहता।

उसे लगता कि आजकल के प्यार की सबसे बड़ी परेशानी यही है—**दूरी और व्यावहारिकता**।



कॉफी शॉप से बाहर निकलते हुए आरव और सिया दोनों चुप थे।
भीड़भाड़ वाली सड़क, हॉर्न बजाते ऑटो, चमचमाती लाइट्स—सब कुछ उनके बीच की खामोशी को और गहरा कर रहे थे।

सिया ने आखिरकार कहा—
*"आरव, तुम जानते हो ना… आजकल रिश्तों को निभाना पहले जैसा आसान नहीं है। करियर, परिवार, टाइम… सबकुछ बीच में आ जाता है।"*

आरव ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया—
*"जानता हूँ, लेकिन अगर चाहो तो रास्ता हमेशा निकल ही आता है।"*

सिया ने उसकी ओर देखा, आँखों में एक चमक और थकान दोनों साथ थीं।


उनकी मुलाक़ात भले ही छोटी रही, मगर असर गहरा था।
वापस मुंबई लौटने के बाद सिया और भी ज़्यादा चैट करने लगी।
वीडियो कॉल पर वह कहती—
*"तुम्हें पता है, मैं आज ऑफिस में कितनी थक गई थी… लेकिन जैसे ही तुम्हें देखती हूँ, लगता है सब ठीक है।"*

आरव हँसकर जवाब देता—
*"तो फिर मेरे बिना तुम जी ही नहीं पाओगी।"*
और दोनों खिलखिला कर हँस पड़ते।

लेकिन यही हँसी, यही मीठी बातें धीरे-धीरे चिंता में बदलने लगीं।



एक दिन सिया ने मैसेज किया—
*"मम्मी-पापा मेरी शादी की बात करने लगे हैं। कहते हैं कि अब 28 की हो गई हूँ, तो और देर क्यों?"*

आरव के दिल में हलचल मच गई।
उसने लिखा—
*"और तुमने क्या कहा?"*

सिया: *"मैंने कह दिया कि अभी करियर पर ध्यान देना है। लेकिन सच बताऊँ तो मैं भी कंफ्यूज़ हूँ आरव। पता नहीं हम दोनों का रिश्ता कहाँ तक जाएगा।"*

आरव देर तक टाइप करता रहा लेकिन कुछ लिख नहीं पाया।
आजकल के प्यार की यही विडंबना है—दिल 'हाँ' कहता है लेकिन दिमाग 'शायद'।


आरव ने देखा कि सिया अक्सर अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर नए-नए लोगों के साथ तस्वीरें डालती है—कभी ऑफिस पार्टी, कभी किसी इवेंट में सेलिब्रिटी इंटरव्यू।

एक रात उसने हिम्मत करके पूछ लिया—
*"तुम इतने लोगों के साथ हो, कहीं तुम्हें किसी और से… मतलब…"*

सिया ने तुरंत जवाब दिया—
*"आरव, प्लीज़! मेरी दुनिया सिर्फ स्क्रीन पर मत देखो। हाँ, मैं सबके साथ काम करती हूँ, हँसती हूँ, तस्वीरें खिंचवाती हूँ, लेकिन दिल में सिर्फ तुम हो।"*

आरव को चैन मिला, मगर मन में जलन का छोटा बीज फिर भी रह गया।
आजकल के रिश्तों में ये जलन और शक बहुत आम है—क्योंकि दुनिया का हर पल सबके सामने लाइव दिखता है।


करीब छह महीने बाद, सिया फिर दिल्ली आई।
इस बार उन्होंने दो दिन साथ बिताए।
कनॉट प्लेस की गलियों में घूमे, इंडिया गेट पर देर रात तक बैठे, और ढाबे पर छोले-भटूरे खाए।

उन पलों में दोनों ने महसूस किया कि उनका रिश्ता सिर्फ स्क्रीन का नहीं, हकीकत का भी है।

सिया ने धीमे से कहा—
*"आरव, काश हम इसी तरह हमेशा साथ रह पाते।"*

आरव ने उसकी हथेली थामते हुए कहा—
*"तो कौन रोक रहा है?"*

लेकिन अगले ही पल दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में झाँककर देखा—
रोकने वाला कोई और नहीं, उनकी अपनी परिस्थितियाँ थीं।


वापस लौटने से पहले, सिया ने कहा—
*"आरव, हमें सच का सामना करना होगा।
हो सकता है मैं किसी दिन मजबूरी में शादी के लिए हाँ कह दूँ। और तुम… तुम्हारे माता-पिता भी तो उम्मीद करते होंगे कि तुम शादी करोगे।"*

आरव चुप रहा।
वह जानता था कि यह सच है।
आजकल का प्यार अक्सर करियर और परिवार की दीवारों से टकरा जाता है।



उस मुलाक़ात के बाद उनके बीच बातें कम होने लगीं।
पहले जो चैट रात-दिन चलती थी, अब दिन में एक-दो मैसेज तक सीमित रह गई।
वीडियो कॉल्स भी कम हो गए।

आरव जब मैसेज करता, तो कभी-कभी घंटों जवाब नहीं आता।
और जब आता, तो बस इतना—
*"Sorry, बहुत बिज़ी थी।"*

आरव समझ गया कि धीरे-धीरे दूरी बढ़ रही है।
लेकिन उसका दिल मानने को तैयार नहीं था।


एक दिन आरव ने देखा कि सिया ने इंस्टाग्राम पर किसी इवेंट की तस्वीर डाली थी—एक साथी पत्रकार के साथ।
कैप्शन था: *“Great evening with colleagues”*।

आरव ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके भीतर एक तूफ़ान चल रहा था।
वह सोचने लगा—
*"क्या मैं बस उसकी लाइफ का एक चैप्टर हूँ? या सच में उसकी कहानी का हिस्सा?"*

आजकल का प्यार अक्सर इन्हीं सवालों में उलझकर रह जाता है।



कुछ दिनों बाद, देर रात कॉल पर सिया ने कहा—
*"आरव, मुझे तुमसे कुछ कहना है।"*

*"क्या?"*

*"मेरे घरवाले फिर से शादी का दबाव डाल रहे हैं। और इस बार… शायद मैं उन्हें मना न कर पाऊँ।"*

आरव की साँसें रुक सी गईं।
*"मतलब…?"*

सिया चुप रही। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, स्क्रीन पर धुंधले दिखाई दे रहे थे।




फोन पर लंबे समय तक खामोशी छाई रही।
आरव चाहकर भी कुछ कह नहीं पा रहा था।
सिया की आवाज़ काँप रही थी—
*"आरव, प्लीज़ मुझे गलत मत समझना। मैंने जितना हो सका घरवालों को रोका, लेकिन… मम्मी बीमार रहती हैं, पापा का कहना है कि अब मुझे ज़िंदगी की स्थिरता चाहिए।"*

आरव ने धीरे से कहा—
*"और मैं? मैं तुम्हारे लिए क्या हूँ?"*

सिया की आँखें भर आईं।
*"तुम… तुम मेरे दिल के सबसे करीब हो। लेकिन कभी-कभी दिल से ज़्यादा दिमाग को सुनना पड़ता है।"*



उस रात के बाद से दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई।
चैट पर वही 'गुड मॉर्निंग' और 'टेक केयर' जैसे औपचारिक शब्द रह गए।
आरव अक्सर उसके ऑनलाइन आने का इंतज़ार करता, लेकिन सिया शायद जानबूझकर कम ऑनलाइन रहने लगी।

आरव सोचता—
*"आजकल का प्यार शायद इसी को कहते हैं—जहाँ लोग दिल से जुड़े रहते हैं, लेकिन हालात उन्हें अलग करने लगते हैं।"*



एक शाम आरव अपने पुराने दोस्त कबीर से मिलने गया।
कबीर ने उसके चेहरे को देखकर ही समझ लिया कि कुछ गड़बड़ है।

*"भाई, तू इतना चुप क्यों है? सब ठीक तो है?"*

आरव ने पूरी कहानी कबीर को सुना दी।
कबीर ने लंबी साँस लेकर कहा—
*"यार, प्यार आज के दौर में आसान नहीं है। हर किसी के पास हज़ार जिम्मेदारियाँ हैं। लेकिन अगर तू सच में सिया से प्यार करता है, तो उसे खोने से पहले लड़ाई लड़नी चाहिए।"*

आरव ने सोचा—
*"शायद कबीर सही कह रहा है। मैं कोशिश तो कर सकता हूँ।"*


अगले ही दिन आरव ने सिया को कॉल किया।
*"सिया, मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ।
क्या तुम मुझसे शादी करना चाहती हो?"*

सिया कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
*"आरव, चाहती तो हूँ… लेकिन चाहना और करना दो अलग बातें हैं।"*

*"तो कर लो न! मैं दिल्ली छोड़कर मुंबई आ जाऊँगा। नई नौकरी ढूँढ लूँगा। बस तुम हाँ कह दो।"*

सिया की आँखों से आँसू बह निकले।
*"तुम इतना सब मेरे लिए क्यों करोगे?"*

*"क्योंकि आजकल के इस शोर-शराबे वाली दुनिया में तुम ही तो मेरी सच्चाई हो।"*

सिया ने कुछ नहीं कहा। कॉल कट हो गई।


अगले कई दिन तक सिया का कोई मैसेज नहीं आया।
उसकी प्रोफ़ाइल भी प्राइवेट हो गई।
आरव बेचैन था। हर पल लगता—*“क्या उसने मुझे ब्लॉक कर दिया?”*

वह दिनभर इंस्टाग्राम खोलता, फिर बंद करता।
व्हाट्सऐप पर 'लास्ट सीन' देखता।
आजकल के प्यार की सबसे बड़ी परीक्षा यही है—डिजिटल सन्नाटा।


करीब एक महीने बाद, दिल्ली एयरपोर्ट पर आरव अपने ऑफिस टूर के लिए खड़ा था।
वहीं सामने उसने देखा—सिया।
वो जल्दी-जल्दी गेट की ओर बढ़ रही थी, हाथ में लगेज और आँखों पर धूप का चश्मा।

आरव ने हिम्मत जुटाकर पुकारा—
*"सिया!"*

सिया ठिठक गई। धीरे-धीरे उसने चश्मा उतारा।
उसकी आँखें लाल थीं, जैसे रोते-रोते थक गई हो।

*"आरव… तुम यहाँ?"*

*"हाँ, और तुम?"*

सिया ने गहरी साँस ली—
*"मैं… शादी के लिए लड़के से मिलने जा रही हूँ।"*

आरव के कदम वहीं जम गए।



आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें सब कह रही थीं।
*"तो… बधाई हो,"* उसने किसी तरह कहा।

सिया की आँखों से आँसू टपक पड़े।
*"मैं मजबूर हूँ आरव। लेकिन एक सच बताऊँ? अगर जिंदगी में कभी किसी से दिल से प्यार किया है, तो वो सिर्फ तुम हो।"*

आरव का गला भर आया।
*"और मैं… शायद हमेशा तुम्हें ही चाहता रहूँगा।"*

इसी बीच फ्लाइट की अनाउंसमेंट हुई।
सिया ने अपना बैग उठाया, आखिरी बार आरव की ओर देखा और गेट के अंदर चली गई।


आरव देर तक उसी जगह खड़ा रहा।
लोग आते-जाते रहे, पर उसकी दुनिया जैसे ठहर गई थी।
उसने सोचा—
*"शायद यही आजकल के प्यार की हकीकत है। लोग दिल से जुड़ते हैं, पर हालात उन्हें जुदा कर देते हैं।"*


एयरपोर्ट की उस मुलाक़ात के बाद आरव की ज़िंदगी जैसे बदल गई।
उसके लिए अब सुबह की चाय, ऑफिस की भाग-दौड़, दोस्तों की बातें—सबकुछ खाली-खाली लगने लगा।

वह अक्सर खुद से सवाल करता—
*"क्या यही प्यार है? या यह सिर्फ एक खूबसूरत याद बनकर रह गया?"*



दिल के दर्द को भूलने के लिए आरव ने खुद को काम में झोंक दिया।
सुबह से देर रात तक लैपटॉप पर कोड लिखना, मीटिंग्स अटेंड करना और रिपोर्ट्स तैयार करना।
लेकिन जितना ज़्यादा वह काम में डूबता, उतना ही सिया की यादें सतातीं।

कभी अचानक नोटिफिकेशन की आवाज़ आती तो लगता—*“शायद सिया का मैसेज है।”*
लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती।


एक दिन हिम्मत करके उसने सिया की प्रोफ़ाइल खोजी।
अब वह प्राइवेट नहीं थी।
उसने देखा—सिया ने अपनी सगाई की तस्वीर डाली थी।
उसकी मुस्कान में खुशी थी, लेकिन आँखों में वही पुराना खालीपन।

आरव देर तक उस तस्वीर को घूरता रहा।
फिर फोन बंद कर दिया।
*"शायद यही आजकल का प्यार है—लोग इंस्टाग्राम पर मुस्कुराते हैं, लेकिन दिल में आँसू छुपा लेते हैं।"*



आरव ने कभी सिया से फिर बात नहीं की।
लेकिन उसके दिल में कई सवाल रह गए—
*"क्या उसने सच में मुझे भुला दिया?
क्या उसने मजबूरी में शादी की हाँ की?
या फिर… मैं ही उसके लिए कभी काफ़ी नहीं था?"*

इन सवालों के जवाब शायद कभी नहीं मिलते।
और शायद यही इस रिश्ते की असली कसक थी।



एक रात कबीर उससे मिलने आया।
*"भाई, तू अभी भी उसी में उलझा हुआ है?"*

आरव ने चुपचाप सिर हिलाया।

कबीर बोला—
*"देख, आजकल के प्यार की यही सच्चाई है। सबकुछ तेज़ी से बदलता है। कल कोई है, आज कोई और। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तेरा प्यार झूठा था। जो तूने महसूस किया, वो असली था। बस उसका अंत वैसा नहीं हुआ जैसा तू चाहता था।"*

आरव ने गहरी साँस ली।
*"शायद तू सही कह रहा है। लेकिन दिल मानना इतना आसान नहीं है।"*



धीरे-धीरे समय बीतता गया।
आरव ने खुद को सँभालना शुरू किया।
वह जिम जाने लगा, नई किताबें पढ़ने लगा, और कुछ नए दोस्तों से भी मिला।

कभी-कभी ऑफिस की पार्टी में कोई लड़की उससे बात करती, तो वह मुस्कुरा देता।
लेकिन उसके दिल के किसी कोने में अब भी सिया ही बसी थी।



एक शाम जब बारिश हो रही थी, आरव ने खिड़की से बाहर देखते हुए अपने फोन में पुरानी चैट खोली।
वो सारे मैसेज—*“Good night Aarav”, “Take care”, “Miss you”*—फिर से आँखों के सामने तैरने लगे।

उसकी आँखें भर आईं।
*"आजकल का प्यार भी अजीब है…
लोग चले जाते हैं, लेकिन उनकी चैट और तस्वीरें हमेशा ज़िंदा रहती हैं।"*


करीब एक साल बाद, आरव मुंबई ऑफिस के प्रोजेक्ट पर भेजा गया।
वह कॉफी शॉप में बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था कि अचानक सामने से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—
*"आरव?"*

उसने नज़र उठाई—वो सिया थी।
अब वह शादीशुदा थी, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी चमक थी।

कुछ पल दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

*"कैसे हो?"* सिया ने पूछा।
*"ठीक हूँ… और तुम?"*
*"ठीक हूँ,"* सिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, लेकिन उसकी आँखें फिर वही कहानी कह रही थीं।


दोनों ने कॉफी ऑर्डर की और बातें करने लगे।
सिया ने कहा—
*"ज़िंदगी वैसी नहीं है जैसी मैंने सोची थी।
जिम्मेदारियाँ हैं, घर है, सबकुछ है… लेकिन कहीं न कहीं एक खालीपन भी है।"*

आरव चुपचाप सुनता रहा।
*"और तुम?"* सिया ने पूछा।
आरव ने धीरे से कहा—
*"मैं अभी भी तुझे याद करता हूँ।"*

सिया की आँखों से आँसू छलक पड़े।
*"काश ज़िंदगी हमें थोड़ा और वक्त देती…"*


कॉफी खत्म हुई।
दोनों उठे।
सिया ने कहा—
*"आरव, मुझे अब जाना होगा। लेकिन एक बात याद रखना—चाहे हालात जैसे भी रहे, तू हमेशा मेरी सबसे बड़ी सच्चाई रहेगा।"*

आरव ने उसकी ओर देखा।
*"और तू… मेरी अधूरी मोहब्बत।"*

दोनों ने बिना कुछ और कहे अलविदा कहा।
भीड़भाड़ वाली सड़क पर चलते-चलते दोनों अलग दिशाओं में खो गए।


सिया से मुंबई में हुई उस मुलाक़ात ने आरव की ज़िंदगी फिर से हिला दी।
वह सोच रहा था कि वक्त ने सब घाव भर दिए हैं, लेकिन सिया को देखकर सारे जज़्बात ताज़ा हो गए।

ऑफिस लौटकर भी वह बार-बार उसी कॉफी शॉप का ख्याल करता रहा—जहाँ दोनों ने फिर से एक-दूसरे की आँखों में छिपी नमी देखी थी।


कई दिनों तक दोनों ने एक-दूसरे से कोई संपर्क नहीं किया।
लेकिन उनके दिलों में एक गहरा बोझ था।

आरव ने डायरी में लिखा—
*"आजकल का प्यार अजीब है।
यह हमें जोड़ता भी है और तोड़ता भी।
हमारे पास मोबाइल हैं, सोशल मीडिया है, हर तरह की कनेक्टिविटी है…
लेकिन दिल का फासला कोई तकनीक मिटा नहीं सकती।"*



करीब दो हफ्ते बाद, एक रात अचानक आरव को व्हाट्सऐप पर सिया का मैसेज आया—
*"जाग रहे हो?"*

आरव का दिल धड़कने लगा।
*"हाँ, तुम?"*

*"हाँ… नींद नहीं आ रही। बस सोचा तुमसे बात कर लूँ।"*

उस रात दोनों ने घंटों बातें कीं।
सिया ने स्वीकार किया—
*"आरव, मेरी शादी से मुझे सबकुछ मिला, लेकिन दिल का सुकून नहीं।
पता नहीं क्यों, लेकिन मैं अब भी तुम्हारे बारे में सोचती हूँ।"*

आरव के लिए यह सुनना किसी मरहम जैसा था, लेकिन साथ ही दर्द भी था।



अगले दिन ऑफिस में आरव बार-बार यही सोचता रहा—
*"क्या हमारे बीच अब भी कोई संभावना है?
या यह बस एक अधूरी चाहत है जिसे पूरा करना असंभव है?"*

उसने खुद से सवाल किया—
*"क्या मैं सिया की ज़िंदगी में दखल दे रहा हूँ? या फिर यह प्यार इतना सच्चा है कि हक़दार है एक और मौका मिलने का?"*

आजकल के रिश्तों में यही सबसे बड़ा संघर्ष है—दिल और दिमाग की जंग।



कुछ समय बाद दोनों फिर से मिले—इस बार समुद्र किनारे, जुहू बीच पर।
लहरें किनारे से टकरा रही थीं, जैसे उनके दिलों की बेचैनी को आवाज़ दे रही हों।

सिया ने धीरे से कहा—
*"आरव, काश हम किसी और दौर में मिले होते। शायद तब ज़िंदगी आसान होती।"*

आरव ने उसकी ओर देखा—
*"लेकिन हमने तो अपना दौर खुद ही चुना है… मोबाइल, सोशल मीडिया, करियर, सबकुछ।
शायद यही आजकल का प्यार है—जहाँ लोग एक-दूसरे को पाकर भी खो देते हैं।"*

दोनों लंबे समय तक चुप बैठे रहे।


जब रात गहराने लगी, सिया उठ खड़ी हुई।
*"मुझे अब जाना होगा,"* उसने कहा।

आरव ने पूछा—
*"क्या यह हमारी आखिरी मुलाक़ात है?"*

सिया कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
\*"शायद… या शायद नहीं। ज़िंदगी का पता नहीं, आरव।"

उसने हाथ बढ़ाया। आरव ने थाम लिया।
दोनों की आँखों में आँसू थे, लेकिन होठों पर हल्की मुस्कान भी।



आरव उसे जाते हुए देखता रहा।
भीड़ में उसका चेहरा धीरे-धीरे गायब हो गया, लेकिन उसके दिल में उसकी मौजूदगी और गहरी होती चली गई।

उस रात आरव ने डायरी में लिखा—

*"आजकल का प्यार पूरा भी है और अधूरा भी।
यह हमें जोड़ता है, लेकिन हमें आज़माता भी है।
सिया मेरी ज़िंदगी से गई या नहीं, यह मैं नहीं जानता…
लेकिन इतना तय है कि वह हमेशा मेरी कहानी का हिस्सा रहेगी।
शायद किसी दिन हम फिर मिलेंगे, या शायद नहीं।
लेकिन यही प्यार की खूबसूरती है—इसका कोई अंत नहीं होता।"*




सोमवार, 22 सितंबर 2025

“पंद्रह साल बाद… अधूरी मोहब्बत की नई सुबह”

 “पंद्रह साल बाद… अधूरी मोहब्बत की नई सुबह”



पंद्रह साल बाद मुंबई एयरपोर्ट पर हुई एक मुलाक़ात ने दो पुराने दोस्तों—विनय और नेहा—की अधूरी मोहब्बत को फिर से जगा दिया।
कॉलेज के सुनहरे दिन, प्यार का इज़हार, जुदाई का दर्द और ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई… यह मर्मस्पर्शी हिंदी प्रेमकथा दिल को छू लेती है।

यह कहानी सिर्फ़ रोमांस नहीं, बल्कि रिश्तों की गहराई, विश्वास और दूसरे मौके की ताक़त को भी दर्शाती है।
पढ़िए “पंद्रह साल बाद… अधूरी मोहब्बत की नई सुबह” और महसूस कीजिए प्यार, दर्द और उम्मीद से भरी यह दिल छू लेने वाली दास्तान।


रात के साढ़े दस बज रहे थे
मुंबई एयरपोर्ट का पैसेंजर लाउंज यात्रियों की भीड़, अनाउंसमेंट्स और भागते-दौड़ते कदमों से गूंज रहा था। सफ़ेद रोशनी में चमकती काँच की दीवारें और एयरकंडीशन की ठंडी हवा उस भीड़-भाड़ को भी सहज बनाने की कोशिश कर रही थीं।

विनय अपनी दिल्ली जाने वाली फ्लाइट का इंतज़ार कर रहा था। उसके हाथ में बोर्डिंग पास था और सामने रखी कॉफी टेबल पर उसने अपनी पुरानी डायरी खोल रखी थी। आदत से मजबूर, वह हर सफ़र के पहले कुछ पंक्तियाँ लिख लिया करता था—जैसे अपने मन को हल्का करने का कोई तरीका हो।

तभी अचानक लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट हुआ—
“Attention Please… Due to bad weather conditions, flight no. 305 to Delhi has been cancelled.”

यह सुनकर विनय चौंक गया।
उसने सोचा शायद उसने ग़लत सुना हो। जल्दी से उठकर वह Enquiry Counter की ओर बढ़ा ताकि पुष्टि कर सके।

वह अभी काउंटर तक पहुँचा भी नहीं था कि सामने से कोई महिला तेज़ी से दौड़ती हुई आती दिखी। उसकी चाल, उसकी घबराहट, सब कुछ विनय को कुछ जाना-पहचाना सा लगा। जैसे कोई बहुत पुराना चेहरा अचानक भीड़ में नज़र आ गया हो।

वह पास आई तो चेहरा साफ़ दिखा।
विनय की सांसें थम गईं।

“नेहा…” उसके होंठों से अनायास ही निकला।

महिला रुक गई।
उसने हैरानी से विनय की तरफ़ देखा। अगले ही पल उसकी आँखों में पहचान की चमक कौंधी।

“विनय…? अरे तुम??”

पंद्रह साल बाद, भीड़-भरे एयरपोर्ट के बीच ये दो पुराने चेहरे आमने-सामने खड़े थे। वक्त जैसे थम गया।

कुछ पल दोनों चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे। चेहरों की झुर्रियाँ, आंखों की थकान, और होंठों पर हल्की मुस्कान—सब कुछ उन पंद्रह सालों की दूरी बयां कर रहे थे।

विनय ने धीरे से कहा—
“यक़ीन नहीं होता, सचमुच तुम हो नेहा? इतने सालों बाद…”

नेहा ने हल्की हंसी के साथ जवाब दिया—
“हाँ, मैं ही हूँ। और सोचो, हम दोनों एक ही वक़्त पर एक ही फ्लाइट के लिए… कितना अजीब संयोग है।”

दोनों पास के एक खाली सोफ़े पर बैठ गए। बाहर रनवे पर खड़े जहाज़ों की लाइटें टिमटिमा रही थीं, लेकिन दोनों के लिए उस वक़्त पूरी दुनिया बस एक-दूसरे के चेहरे में सिमट आई थी।

विनय ने धीरे से पूछा—
“तुम कैसी हो नेहा? ज़िन्दगी कैसी चल रही है?”

नेहा ने गहरी सांस ली।
“अभी सब बताऊँगी… लेकिन पहले तुम सुनाओ। इतने सालों बाद मिल रहे हैं। मुझे तो लग रहा है जैसे हम वापस कॉलेज के दिनों में पहुँच गए हैं।”

विनय मुस्कुराया।
उसकी आँखों में पुराने दिनों की चमक लौट आई।

और फिर, जैसे ही दोनों ने एक-दूसरे को गौर से देखना शुरू किया, उनका मन पंद्रह साल पीछे चला गया—दिल्ली, श्रीराम कॉलेज के सुनहरे दिनों की ओर।

विनय और नेहा दोनों की आंखें जैसे किसी अदृश्य परदे से ढँक गई थीं। एयरपोर्ट की आवाज़ें धीरे-धीरे धुंधली हो गईं और दिमाग़ में एक पुराना दृश्य उभरने लगा—


दिल्ली का श्रीराम कॉलेज
हरी-भरी कैंपस, चहल-पहल से भरी गलियां और हर ओर नए छात्रों की उत्सुकता।
विनय उसी भीड़ में खड़ा था, हाथ में एडमिशन की फाइल लिए।

तभी अचानक तेज़ हवा के झोंके से किसी की फाइल के सारे पन्ने उड़कर चारों ओर बिखर गए।
विनय तुरंत झुककर कागज़ समेटने लगा।
जैसे ही उसने ऊपर देखा, सामने खड़ी थी—नेहा

उसकी आँखों में घबराहट और होंठों पर हल्की मुस्कान।
“थैंक यू… अगर तुम न होते तो मेरे सारे पेपर उड़ जाते।”
विनय ने सिर हिलाया,
“कोई बात नहीं, वैसे भी कॉलेज का पहला दिन है… सबको मदद चाहिए।”

बस वहीं से दोस्ती की शुरुआत हुई।


अगले कुछ हफ्तों में दोनों कई क्लासेज़ में साथ बैठे।
लाइब्रेरी में बुक्स ढूँढना, नोट्स शेयर करना, और सबसे ज़्यादा मज़ेदार—कैंटीन में समोसे और चाय

नेहा को अदरक वाली चाय बेहद पसंद थी। हर बार वह वेटर को कहती—
“भैया, चाय में अदरक ज़रूर डालना।”
विनय हँसता,
“तुम्हारे बिना शायद कैंटीन वाले अदरक रखना ही भूल जाएं।”

धीरे-धीरे दोनों कॉलेज के सबको एक-दूसरे के साथ दिखने लगे।
लोग कहते—
“ये दोनों तो जैसे एक ही टीम हैं।”


ग्रेजुएशन के तीन साल की पढ़ाई में हर प्रोजेक्ट और प्रैक्टिकल दोनों साथ करते।
नेहा बेहद अनुशासित और सीरियस थी, जबकि विनय थोड़ा मस्तमौला।
नेहा अक्सर डाँटती—
“विनय, तुम इतनी लापरवाह क्यों रहते हो? अगर वक़्त पर काम नहीं किया तो मार्क्स कट जाएंगे।”
विनय मुस्कुराकर जवाब देता—
“तुम हो न, मेरे मार्क्स की गारंटी। वैसे भी तुम्हारी प्लानिंग के बिना मैं आधा भी काम नहीं कर पाता।”

यह तकरार ही उनकी दोस्ती की जान बन गई थी।


कॉलेज का कल्चरल फेस्ट—रंगमंच, नाटक, नृत्य और गाने
विनय और नेहा हमेशा साथ भाग लेते।
एक बार दोनों ने मिलकर डुएट सॉन्ग गाया। जब पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा, नेहा की आँखें चमक उठीं।
विनय ने वहीं मन-ही-मन महसूस किया—उसकी खुशी ही मेरी खुशी है।


तीसरे साल में पहुँचते-पहुँचते, विनय का दिल धीरे-धीरे नेहा के लिए कुछ और महसूस करने लगा।
वह हर बात में उसे ढूँढने लगा—क्लास में, लाइब्रेरी में, यहाँ तक कि खाली गलियारों में भी।
नेहा को शायद अंदाज़ा था, लेकिन उसने कभी कुछ नहीं कहा।

एक दिन कैंटीन में बैठे-बैठे दोनों अपने भविष्य के बारे में बातें कर रहे थे।
विनय बोला—
“मेरा सपना है कि ग्रेजुएशन के बाद MBA करूँ, किसी बड़ी कंपनी में जॉब लूँ।”
नेहा ने जवाब दिया—
“और मैं चाहती हूँ पोस्ट-ग्रेजुएशन करूँ और फिर प्रोफ़ेसर बनूँ। मुझे हमेशा से पढ़ाना अच्छा लगता है।”

दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा।
उनमें एक अजीब सा सुकून था—जैसे ये सपने अकेले के नहीं, दोनों के हों।


साल का आखिरी क्लास ।

एग्ज़ाम्स में अब सिर्फ़ दस दिन बाकी थे।
कॉलेज कैंटीन में शोर-शराबे के बीच, विनय ने हिम्मत जुटाई।

उसने धीरे से कहा—
“नेहा… मुझे तुमसे कुछ कहना है।”
नेहा ने किताब बंद की और मुस्कुराई—
“क्या?”

विनय की आवाज़ काँप रही थी।
“मैं… मैं तुम्हें पसंद करता हूँ। सिर्फ़ दोस्त की तरह नहीं, उससे भी ज्यादा।”

नेहा कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में नमी और होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
फिर धीरे से बोली—
“विनय, मुझे भी तुम अच्छे लगते हो… बहुत।”

उस दिन दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर वादा किया—
एग्ज़ाम के बाद, हम अपने रिश्ते को आगे बढ़ाएँगे।


एग्ज़ाम ख़त्म होते ही, नेहा ने विनय को अपने घर बुलाया।
माता-पिता से मिलवाया।
पिता ने पूछा—
“विनय, तुम्हारी आगे की योजना क्या है?”
विनय ने ईमानदारी से कहा—
“मैं MBA करना चाहता हूँ, सर।”

नेहा के पिता ने गंभीर स्वर में कहा—
“अच्छा है। पहले करियर बनाओ, फिर शादी की बात करेंगे।”

विनय और नेहा दोनों ने सिर हिलाया।
उनके दिल में एक विश्वास था—ये रिश्ता टिकेगा।

लेकिन ज़िन्दगी हमेशा वैसे नहीं चलती जैसे हम सोचते हैं।
समय की रफ़्तार तेज़ होती है, और सपनों की राहें कई बार अलग-अलग।

एग्ज़ाम ख़त्म हो चुके थे।
कॉलेज की कैंटीन, लाइब्रेरी, क्लासरूम—हर जगह अब खालीपन था।
तीन साल की यादें मानो दीवारों पर उभर आई थीं।

विनय और नेहा कैंपस में घूमते हुए आख़िरी बार सब कुछ देख रहे थे।
लाइब्रेरी के उस कोने को, जहाँ दोनों देर रात तक पढ़ाई किया करते थे।
कैंटीन की उस खिड़की को, जहाँ से बरसात देखते हुए अदरक वाली चाय पी थी।
और वो ऑडिटोरियम, जहाँ दोनों ने मिलकर डुएट गाया था।

नेहा बोली—
“विनय, सोचो, अब हम रोज़ यहाँ नहीं आएँगे। सब खत्म हो गया।”
विनय ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—
“कुछ भी खत्म नहीं हुआ, नेहा। ये तो बस शुरुआत है। हमारी कहानी अभी लंबी है।”

लेकिन दोनों के दिल में पता था कि अब राहें अलग होने वाली हैं।


कुछ ही दिनों बाद विनय मुंबई चला गया।
उसने वहाँ की एक नामी यूनिवर्सिटी में MBA का एडमिशन लिया।
नई जगह, नए दोस्त, नया माहौल।

नेहा दिल्ली में ही रुकी। उसने पोस्ट-ग्रेजुएशन शुरू कर दिया।
उसका सपना था प्रोफ़ेसर बनने का, और वह उसी दिशा में बढ़ रही थी।

शुरू-शुरू में दोनों की खूब बातें होती थीं।
लंबे-लंबे फोन कॉल्स, देर रात तक चैटिंग, और हर छोटी-बड़ी बात शेयर करना।
विनय अक्सर कहता—
“बस दो साल, नेहा। MBA पूरा होते ही मैं तुम्हारे पापा से शादी की बात करने आऊँगा।”

नेहा मुस्कुराकर जवाब देती—
“मैं इंतज़ार करूँगी, विनय।”


लेकिन वक्त के साथ सब बदलने लगा।
MBA का कोर्स बेहद कठिन था।
केस स्टडीज़, प्रेज़ेंटेशन्स, प्रोजेक्ट्स—विनय दिन-रात इन्हीं में उलझा रहता।
वहीं नेहा भी अपनी पढ़ाई, रिसर्च पेपर्स और कॉलेज की ज़िम्मेदारियों में व्यस्त हो गई।

अब फोन कॉल्स कम हो गए।
चैटिंग में भी सिर्फ़ छोटे-छोटे मैसेज रह गए—
“कैसी हो?”
“ठीक हूँ, तुम?”

वो गहराई, वो लंबी बातें धीरे-धीरे गायब होने लगीं।
दोनों महसूस तो करते थे, पर कुछ कह नहीं पाते थे।


विनय का MBA अब अंतिम सेमेस्टर में पहुँच गया था।
वह भविष्य के सपनों में खोया था—जॉब, करियर, और नेहा के साथ शादी।

तभी एक दिन उसके फ़ोन पर व्हाट्सऐप का मैसेज आया।
भेजने वाली—नेहा

संदेश पढ़ते ही विनय की आँखें फटी की फटी रह गईं।
नेहा ने लिखा था—

“विनय, पापा ने मेरी शादी एक और लड़के से तय कर दी है। वह दिल्ली के एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर है। मैं उसे दो साल से जानती हूँ और मुझे लगता है कि मैं उसके साथ ज्यादा खुश रहूँगी।”

विनय के हाथ काँपने लगे।
उसने बार-बार मैसेज पढ़ा, उम्मीद की शायद ये मज़ाक हो।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद, व्हाट्सऐप पर एक और मैसेज आया—
नेहा और संजय की शादी का कार्ड।


विनय का दिल चकनाचूर हो गया।
जिस लड़की के साथ उसने भविष्य के सारे सपने सजाए थे, वो अचानक किसी और की दुल्हन बनने जा रही थी।

उसने खुद को संभालते हुए सिर्फ़ इतना जवाब लिखा—
“नेहा, तुम्हें शादी की ढेरों शुभकामनाएँ। भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।”

लेकिन अंदर से वह पूरी तरह टूट चुका था।

दिल्ली में शहनाई गूँज रही थी।
लाल जोड़े में सजी नेहा मंच पर बैठी थी। उसके चेहरे पर मुस्कान थी, पर आँखों में कहीं न कहीं एक अजीब सी उदासी भी।
सामने संजय बैठा था—लंबा, पढ़ा-लिखा, कॉलेज में प्रोफ़ेसर।
पर नेहा के दिल में सवाल था—क्या यही वो इंसान है जिसके साथ मैं सचमुच खुश रह पाऊँगी?

विनय शादी में नहीं आया।
हालाँकि उसे न्यौता मिला था, कार्ड पर उसका नाम भी था, लेकिन वह जानता था कि वहाँ जाकर उसका दिल और टूटेगा।
उसने खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया और सारी रात शराब के गिलास के साथ गुज़ारी।


शादी के बाद भी कभी-कभी नेहा के मैसेज विनय तक पहुँचते थे—
छोटी-मोटी बातें, हालचाल पूछना।
लेकिन विनय हर बार अंदर से बिखर जाता।

आख़िरकार उसने फैसला किया।
उसने अपना मोबाइल नंबर बदल दिया, ताकि नेहा से पूरी तरह दूर हो सके।
उसके दिल में एक ही बात घर कर गई—
“अब मैं कभी शादी नहीं करूँगा।”

MBA पूरा होने के बाद विनय को मुंबई में ही एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई।
उसका करियर सँवरने लगा, लेकिन दिल का खालीपन वही रहा।

दूसरी तरफ़, नेहा शादी के बाद अपने नए जीवन में व्यस्त हो गई।
उसके और विनय के बीच की सारी बातें, सारे वादे अब अतीत की धुंध में खो गए।


मुंबई की नई नौकरी, बड़ी कंपनी, शानदार ऑफिस—सब कुछ था।
सहकर्मी कहते—
“विनय, तुम्हारे पास तो सब कुछ है। बढ़िया करियर, अच्छा पैसा, बड़ा फ्लैट। और क्या चाहिए?”

लेकिन विनय हर बार मुस्कुराकर जवाब देता—
“हाँ, सब कुछ है…”
फिर रात को अपने खाली फ्लैट में लौटकर महसूस करता कि उसके पास कुछ भी नहीं है।

दीवारों पर सन्नाटा था।
डाइनिंग टेबल पर सिर्फ़ एक प्लेट रखी होती।
बिस्तर पर सिर्फ़ एक तकिया।

विनय की डायरी अब उसकी सबसे बड़ी दोस्त बन गई थी।
हर रात वह उसमें लिखता—
“नेहा, काश तुम होतीं।”


शादी के शुरुआती दिन ठीक-ठाक थे।
संजय अच्छा इंसान लगा, पढ़ा-लिखा, समझदार।
लेकिन वक्त बीतते ही उसकी असली तस्वीर सामने आने लगी।

संजय बहुत गुस्सैल था।
छोटी-छोटी बातों पर झगड़ता, और कई बार तो हाथ भी उठा देता।
नेहा ने शुरू में समझाने की कोशिश की—
“संजय, शादी प्यार और भरोसे से चलती है। तुम ऐसे क्यों करते हो?”
लेकिन संजय की आदतें नहीं बदलीं।

इसी बीच नेहा को एक बेटी हुई।
उस बच्ची की हँसी में नेहा को थोड़ी राहत मिलती, लेकिन संजय का क्रोध और बेरुख़ी कम नहीं हुई।

दस साल तक नेहा ने सब सहा।
लेकिन एक दिन उसने तय कर लिया—अब और नहीं।


आख़िरकार, कोर्टरूम में नेहा और संजय आमने-सामने खड़े थे।
कागज़ों पर दस्तख़त होते ही रिश्ता खत्म हो गया।

नेहा ने अपने छोटे से सामान के साथ मायके लौटने का फैसला किया।
अब वह दिल्ली में अपनी माँ और पाँच साल की बेटी के साथ रहती थी।
पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे थे।
नेहा अक्सर रात को सोचती—
“शायद पापा होते तो मेरा फैसला आसान होता। लेकिन अब मुझे ही अपनी बेटी के लिए मजबूत बनना होगा।”


मुंबई में विनय का करियर बुलंदियों पर था।
पदोन्नति पर पदोन्नति, मोटी सैलरी, विदेश यात्राएँ।
लेकिन उसके दिल में हमेशा खालीपन था।

लोग पूछते—
“विनय, अब शादी कर लो। उम्र निकल रही है।”
वह हर बार एक ही जवाब देता—
“शादी? नहीं… मैंने फैसला कर लिया है। अब मैं कभी शादी नहीं करूँगा।”

उसकी यह ज़िद किसी को समझ नहीं आती।
पर वह जानता था—जिसे चाहता था, वो अब उसकी नहीं है। और उसके जैसा कोई और है ही नहीं।


विनय और नेहा दोनों ने अपनी-अपनी दुनिया में समझौता कर लिया।
नेहा अपनी बेटी में खुशियाँ ढूँढती रही।
विनय अपने काम में डूबा रहा।

दोनों की ज़िन्दगियाँ अलग-अलग पटरी पर दौड़ रही थीं।
लेकिन दोनों के दिलों में कहीं न कहीं एक कोना अब भी खाली था—
एक-दूसरे के नाम का।


मुंबई एयरपोर्ट पर बैठा विनय अब भी हैरानी से नेहा को देख रहा था।
उसके चेहरे पर अब पहले जैसी मासूमियत तो थी, लेकिन उसमें ज़िन्दगी की थकान साफ़ झलक रही थी।
नेहा की आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, माथे पर हल्की लकीरें—ये सब बता रहे थे कि उसने जीवन में बहुत कुछ सहा है।

विनय ने धीरे से कहा—
“नेहा… सच कहूँ तो मैंने कभी सोचा नहीं था कि हम दोबारा मिलेंगे। वो भी इस तरह।”
नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया—
“हाँ, मैंने भी नहीं। लगता है किस्मत का खेल है।”


दोनों पास के सोफ़े पर बैठ गए।
बाहर बारिश की बूँदें एयरपोर्ट की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से टकरा रही थीं।
भीड़-भाड़ के बीच भी दोनों को ऐसा लग रहा था जैसे समय रुक गया हो।

नेहा ने कहा—
“मैं कॉलेज की तरफ़ से एक कॉन्फ़्रेंस में आई थी। अब वापसी की फ्लाइट पकड़नी थी, लेकिन वो कैंसिल हो गई। और देखो, उसी फ्लाइट से तुम भी जा रहे थे।”

विनय ने हँसते हुए कहा—
“कभी-कभी लगता है ऊपर वाला हमें मिलाने के लिए ही सारी फ्लाइट्स बिगाड़ देता है।”

दोनों हँसे, लेकिन उस हँसी में छिपा दर्द एक-दूसरे से छुपा नहीं था।


कुछ देर बाद विनय ने झिझकते हुए कहा—
“नेहा, मेरे पास एक सुझाव है। मैं यहीं मुंबई में रहता हूँ। मेरा फ्लैट पास ही है। अगर चाहो तो आज रात वहीं चलें। कल सुबह फिर से फ्लाइट ले लेंगे। होटल की झंझट से बच जाओगी।”

नेहा कुछ पल चुप रही।
उसके मन में असहजता थी—पंद्रह साल बाद, सीधे उसके घर?
लेकिन विनय की आँखों में उसे वही पुराना भरोसा दिखा।

नेहा ने धीरे से सिर हिलाया—
“ठीक है, लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि मुझे तुम पर भरोसा है।”


दोनों ने टैक्सी ली।
शहर की रोशनी, ट्रैफिक का शोर, और बारिश से भीगी सड़कों के बीच टैक्सी दौड़ रही थी।

विनय ने धीरे से पूछा—
“नेहा, तुम्हारी फैमिली कैसी है? तुम्हारे पति… सब ठीक है न?”

नेहा ने गहरी सांस ली।
उसकी आँखें झुक गईं।
“शुरुआत में सब ठीक था, विनय। लेकिन धीरे-धीरे सब बदल गया। संजय और मेरे बीच दूरियाँ बढ़ती गईं। कई बार तो उसने मुझ पर हाथ भी उठाया। आखिरकार, चार साल पहले हमारा तलाक हो गया। अब मैं अपनी पाँच साल की बेटी के साथ दिल्ली में माँ के पास रहती हूँ।”

विनय सन्न रह गया।
उसने सोचा, किस्मत ने नेहा के साथ इतना कठोर क्यों किया?
धीरे से बोला—
“मुझे अफ़सोस है, नेहा। तुमने ये सब अकेले झेला।”

नेहा ने उसकी ओर देखा।
“और तुम? तुम्हारी शादी नहीं हुई?”

विनय हल्की हँसी हँस पड़ा।
“नहीं। मैंने तो निश्चय कर लिया था कि अब शादी नहीं करूँगा। सच कहूँ तो… तुम्हारे बाद मुझे कोई और मिला ही नहीं।”

नेहा की आँखें भर आईं।
टैक्सी के शीशे पर गिरती बारिश की बूँदें जैसे उसके आँसुओं को छुपा रही थीं।


कुछ देर बाद टैक्सी एक सोसाइटी के सामने रुकी।
विनय का फ्लैट साफ-सुथरा और बेहद व्यवस्थित था।
नेहा ने हैरानी से कहा—
“ये सचमुच तुम्हारा घर है? बिना किसी औरत के हाथों के इतना सजा-संवरा हुआ?”

विनय मुस्कुराया—
“हाँ, शायद मैंने रहना सीख लिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि घर चाहे कितना भी सुंदर हो, अकेले रहने पर वो सिर्फ़ चार दीवारें ही लगता है।”

नेहा चुप हो गई।
उसे याद आया, कॉलेज के दिनों में विनय का कमरा हमेशा बिखरा हुआ रहता था।
आज का ये बदलाव उसे और भी भावुक कर गया।


विनय किचन में चला गया और बोला—
“तुम्हें तो अदरक वाली चाय बहुत पसंद है न? अभी बनाता हूँ।”

नेहा किचन तक आई।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“नहीं विनय, आज मैं बनाऊँगी। बहुत दिन हो गए तुम्हारे लिए चाय बनाए।”

उस पल दोनों की आँखों से आंसू बह निकले।
किचन की छोटी सी जगह में खड़े होकर उन्हें लगा जैसे वे फिर से कॉलेज के दिनों में लौट आए हों।


किचन से अदरक वाली चाय की महक पूरे फ्लैट में फैल गई।
नेहा कप लेकर लिविंग रूम में आई और विनय के सामने रखते हुए बोली—
“याद है, कॉलेज कैंटीन में तुम हमेशा कहते थे कि मेरी बनाई चाय का कोई जवाब नहीं।”

विनय ने कप हाथ में लेते हुए मुस्कुराया—
“हाँ, और आज इतने सालों बाद फिर वही स्वाद मिला है। सच कहूँ तो… लगता है मैं फिर से वही पुराना विनय बन गया हूँ।”

दोनों ने एक साथ चाय की चुस्की ली।
चाय के हर घूँट के साथ जैसे उनके बीच की चुप्पियाँ पिघलती चली गईं।


नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“वो फेस्ट याद है? जब हम दोनों ने डुएट सॉन्ग गाया था और पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूँज उठा था?”
विनय की आँखों में चमक आ गई।
“कैसे भूल सकता हूँ? वो पहला दिन था जब मुझे लगा था कि तुम्हारी खुशी मेरी सबसे बड़ी जीत है।”

दोनों एक-दूसरे को देखते हुए हँस पड़े।
हँसी के बीच उनकी आँखों में आँसू भी थे।


कुछ देर चुप्पी रही।
फिर विनय ने धीरे से कहा—
“नेहा, मैं तुमसे एक सवाल पूछूँ? तुमने मुझे क्यों छोड़ा? जब हमने इतना कुछ सोचा था… तो अचानक सब क्यों बदल गया?”

नेहा की आँखें झुक गईं।
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“विनय, उस वक़्त मैं कमज़ोर पड़ गई थी। पापा की बातों को मैंने अपनी किस्मत मान लिया। मुझे लगा शायद वही सही है। लेकिन… ये मेरी सबसे बड़ी भूल थी। और उसकी सज़ा मुझे मिल चुकी है।”

विनय ने गहरी सांस ली।
“मैंने भी कोशिश की थी तुम्हें भुलाने की, लेकिन कभी नहीं कर पाया। मैंने तो तय कर लिया था कि अब शादी नहीं करूँगा।”

नेहा ने उसकी ओर देखते हुए कहा—
“और मैंने सोचा था कि शायद तुम्हें भूल जाऊँगी… लेकिन सच तो ये है कि आज भी जब अकेली होती हूँ, तो तुम्हारी यादें ही साथ देती हैं।”


रात गहराती गई।
दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया।
कभी हँसते, कभी रोते, कभी खामोश हो जाते।

विनय बोला—
“तुम्हें पता है, मैंने कई बार सोचा कि तुमसे फिर मिलूँ। लेकिन डर लगता था कि कहीं तुम मुझे पहचानो ही न, या फिर कहो कि अब हमारी कहानी खत्म हो चुकी है।”

नेहा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“विनय, हमारी कहानी कभी खत्म नहीं हुई। बस बीच में रुक गई थी।”

उस पल दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।
लेकिन उन आँसुओं में ग़म से ज्यादा राहत थी—जैसे दिल का बोझ हल्का हो रहा हो।


घड़ी ने दो बजाए।
बाहर बारिश रुक चुकी थी, लेकिन दोनों की बातें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।

नेहा ने कहा—
“काश ये रात कभी खत्म न हो।”
विनय ने धीमे स्वर में जवाब दिया—
“हाँ, काश…”

सोफ़े पर बैठकर दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामे कॉलेज के दिनों से लेकर आज तक की अधूरी दास्तान सुनी और सुनाई।
पूरी रात गुज़र गई—ना नींद आई, ना थकान महसूस हुई।

उनके लिए ये रात किसी नई सुबह की तरह थी।


रात लगभग ढल चुकी थी। खिड़की के बाहर हल्की-सी भोर की रौशनी दिखने लगी थी।
नेहा खामोश बैठी थी, उसकी उंगलियाँ कप के किनारे पर बार-बार घूम रही थीं।
विनय ने देखा, उसके चेहरे पर मुस्कान तो है, लेकिन आँखों के पीछे एक गहरा दर्द भी छिपा हुआ है।

विनय ने धीरे से कहा—
“नेहा… तुम सच बताओ। तुम खुश हो? तुम्हारी ज़िन्दगी ठीक है?”

नेहा ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें अचानक भर आईं।
“खुश? हाँ, लोग यही मानते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि मेरी ज़िन्दगी… टूट चुकी है, विनय।”


नेहा ने काँपती आवाज़ में कहना शुरू किया—
“शादी के बाद शुरू में सब अच्छा था। मैंने सोचा था शायद पापा सही थे… लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलते गए।
संजय… गुस्सैल इंसान था। छोटी-छोटी बातों पर चिल्लाना, अपमान करना, और कई बार हाथ भी उठाना… सब आम हो गया था।”

विनय की आँखों में हैरानी और गुस्सा दोनों थे।
“उसने तुम्हें मारा?”

नेहा ने सिर झुका लिया।
“हाँ… और मैं हर बार सोचती थी कि शायद अगली बार नहीं होगा। लेकिन हुआ… बार-बार हुआ।
फिर मेरी बेटी आई। मुझे लगा बच्ची आने से सब बदल जाएगा। पर कुछ भी नहीं बदला।
चार साल पहले मैंने हिम्मत की और तलाक ले लिया। अब मैं अपनी बेटी के साथ माँ के घर रहती हूँ।”

उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
विनय ने चुपचाप उसकी ओर रुमाल बढ़ा दिया।


कुछ देर चुप्पी रही।
फिर नेहा ने पूछा—
“और तुम, विनय? तुमने शादी क्यों नहीं की? ज़िन्दगी अकेले कैसे काटी?”

विनय ने गहरी साँस ली।
“मैंने कोशिश की थी, नेहा। लेकिन हर जगह मुझे तुम्हारा चेहरा नज़र आता था।
मैंने खुद को समझाया कि आगे बढ़ो, पर नहीं बढ़ पाया।
कई बार घर वालों ने दबाव डाला, लेकिन मैंने साफ़ कह दिया—शादी नहीं करनी।”

उसकी आवाज़ भारी हो गई।
“सच कहूँ, नेहा… तुम्हारे बाद मैंने कभी किसी और को अपना माना ही नहीं। अकेलापन तो था, लेकिन तुम्हारी यादें मेरे साथ थीं। और शायद इसी वजह से मैं जीता रहा।”


नेहा उसकी बातें सुनते हुए फूट-फूटकर रो पड़ी।
विनय ने उसका हाथ पकड़ लिया।
दोनों कुछ देर तक कुछ बोले ही नहीं। बस चुपचाप एक-दूसरे के करीब बैठे रहे।

उस खामोशी में भी बहुत कुछ था—
पछतावा, दर्द, मोहब्बत, और वो सुकून… जो सिर्फ पुराने और सच्चे रिश्तों में मिलता है।


बाहर सूरज निकल चुका था।

नेहा ने धीरे से कहा—
“विनय, कभी-कभी सोचती हूँ… अगर उस दिन मैंने तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ा होता, तो शायद मेरी ज़िन्दगी बिल्कुल अलग होती।”

विनय ने उसकी ओर देखा और बोला—
“हो सकता है। लेकिन अब भी देर नहीं हुई है, नेहा। ज़िन्दगी हमें फिर से एक मौका दे रही है।”

नेहा ने उसकी आँखों में देखा।
उस पल उसे लगा जैसे 15 साल का फासला मिट गया हो।

सुबह की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी।
नेहा चुपचाप खड़ी बाहर आसमान की ओर देख रही थी।
विनय सोफ़े पर बैठा उसे देख रहा था। इतने सालों बाद भी उसे लगता था कि नेहा वैसी ही है—सिर्फ चेहरे पर थोड़ी थकान और आँखों में छिपे दुख ने फर्क डाला था।

विनय के दिल में हलचल थी।
वो चाहता था कि आज सब कह दे, जो इतने सालों से दबा रखा था।


विनय उठकर नेहा के पास आया और धीमे स्वर में बोला—
“नेहा, मैं अब और चुप नहीं रह सकता।
मैंने तुम्हें हमेशा चाहा है। कॉलेज के दिनों से लेकर आज तक… और सच तो ये है कि मैंने तुम्हारे अलावा कभी किसी और के बारे में सोचा ही नहीं।”

नेहा की साँसें तेज़ हो गईं।
उसने काँपते होंठों से कहा—
“विनय… मैं भी तुम्हें कभी भूल नहीं पाई। लेकिन मैं डरती हूँ… मैं एक तलाकशुदा औरत हूँ, एक बच्ची की माँ हूँ। क्या तुम सच में मुझे वैसे ही अपनाओगे?”


विनय ने दृढ़ता से कहा—
“नेहा, तुम्हारी बेटी मेरी अपनी होगी। और तुम्हारा अतीत? वो तुम्हारी गलती नहीं थी, बल्कि तुम्हारे हालात थे।
मैंने तो हमेशा तुम्हें वैसे ही चाहा है जैसे तुम हो। और आज भी वही चाहता हूँ।”

नेहा की आँखों से आँसू बह निकले।
वो रोते हुए बोली—
“काश मैंने ये पहले समझा होता… तो शायद आज ये हालात न होते। विनय, मैंने बहुत कुछ खोया है… लेकिन अब मैं और खोना नहीं चाहती।”


नेहा ने धीरे से विनय का हाथ पकड़ लिया।
“विनय, अगर तुम सच में मुझे अपनाना चाहते हो… तो मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ—मैं आज तुमसे पहले से भी ज़्यादा प्यार करती हूँ।”

विनय ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तो सुन लो, नेहा… मैं भी आज उतना ही नहीं, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा प्यार करता हूँ जितना कॉलेज के दिनों में करता था।”

दोनों के आँसू बह रहे थे।
वो एक-दूसरे के गले लग गए।
जैसे 15 साल का बोझ एक पल में उतर गया हो।


उस आलिंगन में ना कोई सवाल था, ना कोई डर।
सिर्फ भरोसा था—कि अब ज़िन्दगी उन्हें फिर से एक साथ जीने का मौका दे रही है।

बाहर धूप और तेज़ हो चुकी थी।
लेकिन उनके लिए आज की सुबह किसी नये सवेरा से कम नहीं थी।


सुबह का समय था।
नेहा अपना ट्रॉली बैग लेकर दरवाज़े की ओर बढ़ी।
चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में भारीपन साफ़ झलक रहा था।

विनय ने बैग उठाकर बाहर तक पहुँचा दिया।
दोनों चुपचाप खड़े रहे—जैसे कुछ कहना चाहते हों लेकिन शब्द साथ न दे रहे हों।

नेहा ने मन ही मन सोचा—
“काश वो मुझे रोक ले…”
और विनय सोच रहा था—
“काश वो खुद कह दे कि मैं रुक जाऊँ…”


नेहा दरवाज़े से बाहर निकली ही थी कि अचानक उसका पाँव फिसल गया।
वो गिरने ही वाली थी कि विनय ने झट से उसे संभाल लिया।
दोनों एक-दूसरे से लिपट गए।

नेहा की आँखों से आँसू छलक पड़े।
विनय की आवाज़ भीग गई—
“नेहा, मैं आज भी तुमसे उतना ही प्यार करता हूँ जितना पहले करता था… बल्कि अब और ज़्यादा।”

नेहा ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा और कहा—
“और मैं तुमसे पहले से भी ज़्यादा। मैंने जो गलती 15 साल पहले की थी, उसकी सज़ा मुझे मिल चुकी है। अब मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ना चाहती।”


विनय ने नेहा का हाथ थाम लिया।
“तो फिर अब कोई दूरी नहीं। तुम्हारी बेटी मेरी भी बेटी है, नेहा। और तुम… मेरी हमेशा की साथी।”

नेहा सिसकते हुए मुस्कुरा दी।
उसने अपना सिर विनय के कंधे पर रख दिया।
दोनों की आँखों से बहते आँसू इस बार दुख के नहीं, बल्कि सुकून और खुशी के थे।


उस पल उन्हें लगा मानो किस्मत ने 15 साल बाद उनकी अधूरी कहानी को फिर से जोड़ दिया हो।
बाहर सूरज पूरी तरह निकल चुका था।
रोशनी पूरे कमरे में फैल रही थी।

नेहा ने धीरे से कहा—
“विनय, अब हमारी ज़िन्दगी की नई शुरुआत है।”
विनय ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—
“हाँ, नेहा। अब कोई जुदाई नहीं। बस साथ… हमेशा के लिए।”


उस सुबह दोनों ने तय किया कि अब वे मिलकर जीवन बिताएँगे।
नेहा अपनी बेटी के साथ एक नया घर बसाएगी और विनय, जो इतने सालों से अकेला था, अब उसका और उसकी बेटी का सहारा बनेगा।

यह नई शुरुआत थी—
जहाँ अधूरे सपने पूरे होंगे,
जहाँ अतीत की तकलीफ़ें पीछे छूट जाएँगी,
और जहाँ प्यार एक बार फिर अपनी असली मंज़िल पा लेगा।

“दूर कहीं उजाला”

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