रविवार, 23 अगस्त 2020

माँ वैष्णो देवी की यात्रा भाग - 3

 

माँ वैष्णो देवी की यात्रा भाग - 


यात्रा का पाँचवाँ  दिन 01   अक्टूबर  2009 दिन गुरुवार 

आज यात्रा का अंतिम दिन था, जिसमे शिव खोड़ी की यात्रा के बाद वापस जम्मू से ट्रैन पकड़ना था।  सुबह जल्दी उठकर फ्रेश होकर गाड़ी वाले को फ़ोन किया तो ओ बोला की मै रास्ते में हू और पांच मिनट में पहुंच जाऊँगा।  हम लोगों ने सामान पहले ही पैक कर लिया था और अब कमरे से निकल कर रिसेप्शन पर आ गए, होटल वाले का बिल भुगतान किया उसके बाद सड़क पर आ गए, कुछ ही देर में गाड़ी भी आ गई।  सभी लोग गाड़ी में सामान रखने  के बाद बैठ गए, उसके बाद गाड़ी कटरा बस अड्डा होते हुए शिव खोड़ी जाने वाले मार्ग  पर पहुंच गई।  कुछ देर बाद पहाड़ी रास्तो पर गाड़ी चलने लगी और सभी लोग पहाड़ पर चलते हुए रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर - सुन्दर पहाड़ों को देख कर रोमांचित होने लगे।  

कटरा से शिव खोड़ी की दूरी लगभग 75 किलोमीटर है  जो जम्मू के रियासी जिले में पड़ता है और रास्ता भी पहाड़ी और रोमांच से भरपूर है, वैसे तो इस यात्रा में लगभग दो घंटे लगते है, किन्तु हम लोग रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर दृश्यों का आनंद लेते और मंदिरो के दर्शन करते हुए चल रहे थे इसलिए समय ज्यादा  लग रहा था।  सबसे पहले बाबा अगहर जित्तो की  मूर्ति के पास रुके, उसके बाद बाबा धनसार में रुके, उसके बाद   हम लोग एक प्रमुख मंदिर नौ देवी में रुके, जिसके बारे में मान्यता है की यहाँ नौ देविया एक  साथ विराजमान है, और  एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है, मंदिर के नीचे ही एक पतली सी जलधारा बहती है जिसका पानी बहुत स्वच्छ और साफ है, गुफा काफी सकरी है जिसमें अंदर एक साथ दो तीन लोग ही जा पाते है, हम लोगों ने भी प्रसाद लेकर जलधारा में पैर धोया और उसके बाद दर्शन किये। 
   


यह चित्र मंदिर के द्वार का है जो गूगल से लिया गया है 


इस तरह हम लोग 10 बजे रनसू पहुंच गए, यहाँ से शिव खोड़ी की पैदल यात्रा साढ़े तीन किलोमीटर की है, सामान  हम लोगों ने गाड़ी में ही छोड़ दिया, एक छोटे से बैग में मतलब भर का सामान लेकर बाबा के दर्शन के लिए चल दिए। यहाँ से जब शिवखोड़ी के लिए आगे बढ़ते हैं, तो रास्ते में एक नदी पड़ती है। नदी का जल दूध जैसा सफेद होने की वजह से इसे दूध गंगा भी कहते हैं। करीब दो घंटे की यात्रा के बाद हम लोग बाबा के भवन तक पहुंचे, शिवखोड़ी स्थान पर पहुँचते ही सामने एक गुफ़ा दिखाई देती है। गुफ़ा में प्रवेश करने के लिए लगभग 60 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। गुफ़ा में प्रवेश करते ही लोगों के मुख से  बरबस ही जय बाबा  बर्फानी और ॐ नमः शिवाय का उद्घोष  होने लगता है।   वहां पर हाथ पैर धोने के बाद सामान एक दुकान पर रख दिए और लाइन में लग गए।  थोड़ी ही देर में उस जगह पहुंच गए जहाँ से बाबा की गुफा  प्रारम्भ होती है।  गुफ़ा का मुहाना काफ़ी बड़ा है। यह 20 फीट चौड़ा और 25  फीट ऊँचा है। गुफ़ा के मुहाने पर शेषनाग की आकृति के दर्शन होते है और यहाँ पर भी अमरनाथ की तरह कबूतरों का जोड़ा दिख जाता है, हम  सभी लोग एक जगह पर बैठ गए, इस समय इतनी शांति मिली की जिसका वर्णन करना बहुत मुश्किल है, जीवन में पहली बार इस तरह का एहसास हुआ,  सारी थकान जैसे पल भर में दूर हो गई और मन में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया।  

कुछ देर रुकने के बाद हम लोगों ने भी गुफा  में प्रवेश किया, ये एक 800 फिट  लम्बी, 3  फिट  चौड़ी और लगभग 6  से 8  फिट  ऊँची गुफा है, जिसमे जगह जगह से पानी की बूंदे गिरती रहती है, कमजोर दिल वाले अंदर जाने से घबराते  है, उनके लिए बाहर  से एक रास्ता बनाया गया है, जिसमे बिना गुफा में प्रवेश किये ही वे अन्दर मुख्य हाल तक पहुंच जाते है, गुफा से प्रवेश करने वालों का निकास द्वार भी वही रास्ता है।  हम लोग भोले शंकर का जै कारा लगाते  हुए गुफा में प्रवेश कर गए शुरू में डर लग रहा था लेकिन ॐ नमः शिवाय का जप करते हुए  चलते रहे और सारा डर समाप्त हो गया  और अंदर हाल में पहुंचने के बाद तो सब भूल गया, गुफा की भव्यता अकथनीय और अकल्पनीय है।  वहाँ पुजारी जी बता रहे थे , गुफा में  भगवान शंकर का 4 फीट ऊँचा शिवलिंग है। इसके ठीक ऊपर गाय के चार थन बने हुए हैं, जिन्हें कामधेनु के थन कहा जाता है। इनमें से निरंतर जल गिरता रहता है।


शिवलिंग के बाईं ओर माता पार्वती की आकृति है। यह आकृति ध्यान की मुद्रा में है। माता पार्वती की मूर्ति के साथ ही में गौरी कुण्ड है, जो हमेशा पवित्र जल से भरा रहता है। शिवलिंग के बाईं ओर ही भगवान कार्तिकेय की आकृति भी साफ़ दिखाई देती है। कार्तिकेय की प्रतिमा के ऊपर भगवान गणेश की पंचमुखी आकृति है। शिवलिंग के पास ही में राम दरबार है। गुफ़ा के अन्दर ही हिन्दुओं के 33 करोड़ देवी-देवताओं की आकृति बनी हुई है। गुफ़ा के ऊपर की ओर छहमुखी शेषनाग, त्रिशूल आदि की आकृति साफ़ दिखाई देती है। साथ-ही-साथ सुदर्शन चक्र की गोल आकृति भी स्‍पष्‍ट दिखाई देती है। गुफ़ा के दूसरे हिस्से में महालक्ष्मी, महाकाली, सरस्वती के पिण्डी रूप में दर्शन होते हैं। हम लोग लगभग आधा घंटा गुफा में रहे उसके बाद बाहर निकल आये। 

बाहर आकर दुकान से सामान लिया और  दुकान पर बैठ कर चाय पिया गया और नास्ता  किया उसके बाद वापस रनसू की   की ओर वापस चल दिए। बीच में दूध गंगा नदी के पास रुके और बच्चो ने पानी में खूब आनंद लिया, हम लोग भी पानी में घुसकर एक बड़े पत्थर पर बैठ कर पानी में तैरती मछलियों को काफी देर तक देखते रहे, उसके बाद फिर रंसू की ओर चल दिए और लगभग 2 बजे रन सू पहुंच गए। अब हम लोगों को जम्मू जाना था जो यहां से लगभग 100 किलोमीटर था, गाड़ी के ड्राईवर ने कहा कि रास्ते में एक दो मंदिर और पड़ेंगे वहां भी दर्शन करते हुए आपको शाम तक जम्मू स्टेशन पहुंचा देंगे। इस  प्रकार शाम को पांच बजे हम लोग जम्मू पहुंच गए, सभी लोग थके हुए थे तो जिस प्लेट फार्म पर ट्रेन आने वाली थी उसी पर एक बेंच पर डेरा जमाया गया और कुछ लोग नीचे चद्दर बिछा कर आराम किए, ट्रेन अपने निर्धारित समय से 15 मिनट देरी से जम्मू से चल दी और अगले दिन शाम तक हम लोग अपने घर पहुंच गए,  इस तरह हम लोगों की मा वैष्णो देवी की यात्रा समाप्त हुई। ये यात्रा मैंने 2009 में की थी लेकिन लिखने का मौका अब मिला क्योंकि उस समय मै  ब्लॉग नहीं लिखता था, ब्लॉग लिखना मैंने 2019 में शुरू किया और मार्च से लेकर अब तक कोई यात्रा नहीं हो पाई थी सोचा कि जो यात्राएं पहले की गई है क्यों न उनको लिखा जाए, फोटो कुछ उस समय मोबाइल से लिए गए थे और कुछ गूगल से, लॉक डाउन के बाद होने वाली यात्रा भी जल्दी ही आएगी।





See the source image





मंगलवार, 11 अगस्त 2020

माँ वैष्णो देवी की यात्रा भाग - 2


यात्रा का तीसरा  दिन 29  सितम्बर 2009 दिन मंगलवार 

हम लोग कमरे से करीब सात बजे माँ के दरबार में जाने के लिए निकले, माँ का जयकारा लगाते हुए और भजन गाते हुए पूरे उत्साह में हम लोगों की टोली चल रही थी जिसमे बच्चे सबसे आगे चल रहे थे, कुछ दूर चलने के बाद थकान महसूस होने लगी तो एक दुकान से सभी लोगों ने डंडा लिया जिसके सहारे चढ़ाई करने में आसानी होती है और डंडे के सहारे चलते हुए बाणगंगा नदी पर पहुंच गए, चेक पोस्ट पर सिक्योरिटी चेक होने के बाद आगे बढे,  बाणगंगा नदी के किनारे बैठकर नदी के जल को निहारते हुए असीम सुख का आनंद महसूस हुआ कुछ बच्चों ने वहाँ नहाया भी और जी भरकर अठखेलिया की उसके बाद फिर आगे की यात्रा शुरू हो गयी, चूकि हम लोगों की टोली में महिलाये और बच्चे ज्यादा थे तो ओ जगह - जगह रुकते हुए चल रहे थे, बीच - बीच में थकान होने पर कुछ देर कही अच्छी जगह देखकर बैठ जाते और आराम करने लगते इसलिए चढ़ाई में समय ज्यादा  लग रहा था ।

हम लोग 4 बजे अर्धकुमारी पहुंचे और सबसे पहले दर्शन की  पर्ची ली गई, इस समय सभी लोग बहुत थक चुके थे तो फ्रेश होकर हाल के बाहर एक जगह चद्दर बिछा कर आराम करने लगे, वही पर सभी लोगों ने होटल में जाकर खाना खाया और आराम करते करते सो गए, शाम को 6 बजे नींद खुली तब तक अर्द्धकुमारी में दर्शन का समय भी हो गया था, माँ का दर्शन किया गया और थोड़ी देर बाद लगभग साढ़े सात बजे भवन की ओर प्रस्थान किया गया, अर्द्धकुमारी से भवन तक की चढ़ाई हम लोगों ने साढ़े तीन घंटे में पूरी  कर ली और लगभग ग्यारह बजे माता के भवन तक पहुँच गए, सभी लोग काफी थके  हुए थे तो रात्रि में विश्राम कर सुबह 4 बजे दर्शन का निर्णय लिया गया, पास में ही स्थित दुकान से छोला पूड़ी, कढ़ी चावल और राजमा चावल खाया गया और स्टोर से कम्बल लेकर एक जगह देखकर बिछाकर सो गए, सुबह 4 बजे उठे और नहा धोकर तैयार  होने के बाद सामान रखने के लिए लॉकर की तलाश हुई, लॉकर में सामान रखने के बाद प्रसाद लिया गया उसके बाद  लिए लाइन में लग गए, अब तक लगभग साढ़े 6 बज चुके थे। 

सुबह के समय दर्शन करने के लिए भीड़ कुछ ज्यादा  थी, सभी लोग पूर्ण श्रद्धा भाव से माता का जैकारा लगाते हुए आगे बढ़ते रहे और करीब आठ बजे गुफा के बाहर लगी माँ की विशाल प्रतिमा के दर्शन हुए, लाइन  धीरे चलने लगी किन्तु अब कोई जल्दी नहीं थी, हर कोई माँ का गुणगान करता हुआ मन में माँ की प्रतिमा को वसा लेना चाहता था, कुछ देर बाद हम लोग भी गुफा में प्रवेश किये अब तो भक्तो का उत्साह दुगना हो चुका  था और मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था जैसे शरीर की  सारी थकान दूर हो चुकी है, एक ऐसी अलौकिक शीतलता का आभास हुआ जिसका  शब्दो में बर्णन  कर पाना संभव नहीं है, कुछ देर बाद माँ की पिंडी के पास पहुंच गए पुजारी जी ने बताया की ये  माँ महाकाली (दाएं), माँ महासरस्वती  (मध्य) और मां महालक्ष्मी (बाएं) विराजमान  है कुछ सेकण्ड ही दर्शन हुआ उसके बाद आगे बढ़ा दिए गए, माँ के पिंडी की अलौकिक छटा को आँखों में बसाते हुए आगे बढ़ गए, उसके बाद मंदिर परिसर से निकलते समय प्रसाद और नारियल लिया गया और नीचे स्थित दाहिने तरफ  अन्य मंदिरो का दर्शन किया गया, जिसमे शिव लिंग जिस पर प्राकृतिक रूप से पहाड़ी से जल गिरता रहता था अपने आप में अद्भुत था।
 

अब तक लगभग नौ बज चुके थे,  वहां से दर्शन करने के पश्चात एक दुकान पर बैठ कर जलपान किया गया और उसके बाद लाकर से सामान निकाल कर ऊपर आ गए जहाँ  से भैरो घाटी की चढ़ाई शुरु होती है,  ऐसी मान्यता है की जब तक भैरो बाबा के दर्शन नहीं किये जाते है तब तक माँ वैष्णो देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है, भवन से भैरो घाटी की दूरी वैसे तो साढ़े तीन किलोमीटर की है परन्तु ये खड़ी चढ़ाई है इसलिए इसमें थकान ज्यादा होती है, हम लोगों ने दस बजे चढ़ाई शुरु की और करीब एक बजे भैरो घाटी पहुच गए, थोड़ी देर आराम करने के बाद हाथ मुह धोकर प्रसाद लेकर बाबा भैरो नाथ का दर्शन किया गया और दर्शन के बाद दोपहर का भोजन भी वही किया गया और कुछ देर तक मोबाइल से फोटोग्राफी की गयी 

यात्रा का चौथा   दिन 30  सितम्बर 2009 दिन बुधवार 

भैरो घाटी से करीब तीन बजे वापसी की यात्रा प्रारंभ हुई और लगभग सात बजे हम लोग अर्ध्कुमारी पहुच गए, चूकी हम लोगों के साथ बच्चे और महिलाये थी इसलिए हम लोग बहुत आराम से चल रहे थे, अब तक सभी लोग बहुत थक चुके  थे और ये निर्णय लिया गया की रात यही रुका जाये और सुबह यहाँ से चला जायेगा, किराये पर कम्बल लेकर एक साफ सुथरी जगह देखकर डेरा जमाया गया, जिसको जो खाना था खाया और फिर सो गए, अगले दिन सुबह चार बजे उठने के बाद फ्रेश होकर कम्बल आदि जमा करने के बाद 6 बजे अर्ध्कुमारी से नीचे की यात्रा शुरु हुई और रुकते चलते 11 बजे तक हम लोग कटरा पहुच गए, और नहा धोकर खाना खाकर सो गए, शाम को 4 बजे उठने  के बाद कटरा नगर घूमने  गए, कटरा की गलियों में घूमते हुए कुछ सामानों की खरीददारी की गयी और कल शिवखोड़ी जाने के लिए एक गाड़ी भी 2500 रूपये में तय कर ली गयी जो कल सुबह 6 बजे तक आ जायेगी और शिवखोड़ी दर्शन कराने के बाद जम्मू स्टेशन पर छोड़ देगी, जहाँ  से रात में हम लोगों की वापसी की ट्रेन है  

कटरा में ऐसे कई लोग मिले जो अपने यहाँ से जाकर वहां  की प्राकृतिक सुन्दरता से प्रभावित होकर वही बस गए है और अपना रोजी रोजगार कर रहे है, ऐसे ही एक कानपुर के दूबे  जी मिले जो वहां ट्रेवल एजेंसी चलाते है, हम लोगों ने उन्ही की गाड़ी हायर की थी, काफी मिलन सार  और सहयोगी व्यक्ति थे, कटरा बाज़ार घूमते और खरीददारी करते करीब 9 बज गए, उसके बाद हम लोग एक होटल पर खाना खाकर अपने कमरे पर आ गए और कल की तैयारी करने के बाद सो गए 






 





सोमवार, 3 अगस्त 2020

माँ वैष्णो देवी की यात्रा भाग – 1

माँ वैष्णो देवी की यात्रा भाग – 1

यात्रा का दिनांक 27 सितम्बर 2009 दिन रविवार

ये यात्रा मैंने बहुत पहले की थी और जब से करोना के कारण लाक डाउन हुआ तब से कोई भी यात्रा नहीं हो पाई तो सोचा की जो यात्राये पहले की जा चुकी है उन्ही को क्यों न स्मृतियों के आधार पर करोना काल में लिखकर यात्रा का आनंद लिया जाय I
बात उन दिनो की है जब मैं गोरखपुर में रहता था, माँ वैष्णो देवी के बारे में बहुत लोगों से सुना था लेकिन अभी तक दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला था, बहुत दिनों से विचार बन रहा था की माता के दर्शन करने के लिए जाये, कई लोगों से वहा जाने एवं दर्शन करने के बारे में जानकारिया इकट्ठा  की और अंत में फाइनल हो गया की अब माँ के दर्शन के लिए जाना है, नौ जून 2009 को सबका रिजेर्वशन हो गया और एक भारी  भरकम समूह तैयार हो गया जिसमे मेरे माता पिता, मै मेरी पत्नी और तीनों बच्चे मेरे मामा मामी मेरी मौसी और मेरी माँ की बुवा जी कुल  मिलाकर 11 लोग यात्रा के लिए तैयार हो गए और 27 सितम्बर का गोरखपुर से जम्मू का रेजेर्वशन  हो गया I
अभी यात्रा में बहुत समय था और इस बीच बहुत सारे परिवर्तन हुए पहला ये की मै गोरखपुर से लखनऊ आ गया और एक नई कंपनी में नौकरी ज्वाइन कर ली, बहुत दिनों से प्रयास रत था की लखनऊ में नौकरी मिल जाये तो बच्चो की पढाई लिखाई के लिए अच्छा रहेगा और माँ वैष्णो देवी के आशीर्वाद से जुलाई में ही मै लखनऊ आ गया, नौकरी अभी नई थी इसलिए मै अकेला ही लखनऊ में रहकर नौकरी करने लगा और महीने में एक दो बार छुट्टी मिलने पर गोरखपुर चला जाता था इस प्रकार समय का पहिया घूमता रहा और कुछ दिनों तक माँ के दरबार में जाने का ध्यान ही नहीं रहा, सितम्बर के पहले हफ्ते में मेरे मामा जी ने याद दिलाया तो ध्यान आया की अरे हम लोगों को तो 27 तारीख को ट्रेन पकडनी है I

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

मेरी धार्मिक यात्राये

मेरी धार्मिक यात्रायें

धार्मिक यात्राओ को पढ़नेके लिए नीचे क्लिक करें


·     विन्ध्याचल की यात्रा   

बुधवार, 10 जून 2020

उज्जैन, ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर यात्रा भाग - 4

उज्जैन, ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर यात्रा शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

उज्जैन, ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर यात्रा भाग - 4

यात्रा का दिनाँक 13/08/2018


आज यात्रा का आखिरी दिन था और कल की यात्रा से सीख लेते हुए हम लोगों ने समय का विशेष ध्यान रखा और रात मे ही प्लान तैयार कर लिया था कि आज उज्जैन में स्थित सारे मंदिर एवं प्रमुख स्थानों की यात्रा सुनियोजित तरीके से किया जायेगा, सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्म से निवृत्त हो कर सबसे पहले नीचे  उतरकर चाय पिया गया और वहीं पर एक टाटा मैजिक वाले से पूरा उज्जैन घूमने के लिए 6 सौ रूपये में तय कर लिया गया जिसमे वह सभी छोटे बड़े मंदिरो का दर्शन कराएगा। 

गढ़कालिका मंदिर   

सबसे पहले गढ़ कालिका मंदिर में दर्शन के लिए गए, यह उज्जैन का एक लोकप्रिय एवं प्रमुख मंदिर है, यहाँ देवी की पूजा की जाती है जो महा  कवि कालीदास जी की  ईस्ट देवी मानी जाती है

रविवार, 31 मई 2020

यात्रा - पड़ाव - यात्रा ( कभी न समाप्त होने वाली ) भाग -1

यात्रा - पड़ाव - यात्रा  ( कभी न समाप्त होने वाली ) भाग -1 

यात्रा की शुरुवात का  दिनाँक  16 / 04 / 2019 

यात्रा एक ऐसा शब्द है जिसका नाम आते ही एक जगह से दूसरी जगह जाने का एहसास होता है, परन्तु यदि गहराई से सोचा जाए तो हर प्राणी अपनी यात्रा पर है, या यूँ कहा जाए की यात्रा एक प्राणी के जीवन का शाश्वत सत्य है जो कभी रुकती  नहीं निरन्तर चलती  रहती  है, प्राणी के जन्म से लेकर बचपन तक की यात्रा, बचपन से लेकर जवानी तक की यात्रा, जवानी से लेकर बुढ़ापे तक की यात्रा और अन्त में जीवन की अन्तिम यात्रा और इस प्रकार एक प्राणी का जीवन चक्र पूरा  हो जाता है।  यात्रा के बीच में  एक बहुत महत्वपूर्ण समय आता है जिसे पड़ाव कहा जाता है, वैसे यात्रा का उद्देश्य ही होता है पड़ाव तक पहुंचना, पड़ाव तक पहुंच कर प्राणी कुछ समय के लिए ठहर सा जाता है , परन्तु पड़ाव भी  यात्रा का ही एक हिस्सा होता है, पड़ाव कभी छोटा तो कभी बड़ा होता है, यात्रा का जितना आनंद चलते रहने में आता है उससे कही ज्यादा आनंद पड़ाव में बिताये गए समय में आता है और फिर पड़ाव जब उबाऊ हो जाता है तो अगली यात्रा पर चलने का समय आ जाता है। 

मित्रों  आज मैं   ऐसी ही एक यात्रा के पड़ाव बारे में लिखने से अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूँ जिसका मै स्वयं भी हिस्सा था, तो मित्रों समय व्यर्थ न करते हुए चलिए चलते है  यात्रा के एक छोटे से पड़ाव पर। 

इस यात्रा की शुरुआत पिछले वर्ष अप्रैल के महीने से होती है, जब मैं ऑफिस में बैठा काम कर रहा था, अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी, फोन उठाने पर दूसरी तरफ से किसी लड़की की आवाज आयी जो किसी बीमा से सम्बंधित काम के लिए बता रही थी, बात चीत करने पर मै उसके द्वारा बताये गए काम को करने के लिए उत्सुक हो गया, कुछ फार्मलिटी बताई और आगे की कार्यवाई के  लिए  अपने प्रतिनिधि को मेरे पास भेजने के लिए  कह कर फोन रख दिया।  

दो - तीन दिनों के बाद एक सज्जन राजेंद्र चौधरी जी मेरे पास आये और सारी  फार्मलिटी पूरी हो गयी, काम के सिलसिले में ही  मेरा और राजेंद्र जी का मिलना  हुआ करता था, वे कभी - कभी मेरे ऑफिस में भी आते थे तो इस तरह से उनसे एक मित्रवत सम्बन्ध हो गया था, एक दिन बातों ही बातों में पता चला की ओ भी मेरे गृह जनपद गोरखपुर के ही रहने वाले है, घर से दूर रहने वाले लोगों में गृह जनपद के लोगों के प्रति लगाव और बढ़ जाता है, तो इस प्रकार  हम लोगों की मित्रता और भी प्रगाढ़ हो गयी। 

एक दिन राजेंद्र जी से मुलाकात हुई तो उन्होंने पूछा सर कहीं मकान किराये पर मिल जायेगा, वे अभी जहाँ रहते थे शायद वहाँ कुछ दिक्कत हो रही थी, संयोग वश उस समय मेरे घर का नीचे का पोर्शन खाली था, मैंने उन्हें बताया की मेरे यहाँ ही एक बार देख लें और यदि पसंद आये तो ठीक है नहीं तो दूसरा कोई मकान देखा जायेगा, अगले रविवार को ही राजेन्द्र जी मकान देखने आ गए, मकान देखने के बाद कुछ देर मेरे यहाँ बैठे रहे चाय पानी हुआ उसके बाद चले गए।  

मेरा घर जिस जगह है ओ अभी अविकसित एरिया है तो सड़क की स्थिति कुछ दूर तक  ठीक नही है, वैसे मुझे उम्मीद थी की मकान उन्हें पसंद नहीं आएगा, लेकिन दो दिन बाद वे मेरे ऑफिस आये और बोले कि मकान मुझे पसंद है और मैं अगले रविवार को उसमे शिफ्ट करूँगा, मैंने कहा ठीक है, अगले रविवार यानि 05 जून 2019 को वे अपना सामानआदि लाकर शिफ्ट हो गए। संयोग कहा जाए या कुछ और दूसरे ही दिन पम्प  हाउस (पानी का सप्लाई जहाँ से आता है ) का मोटर जल गया, जून के महीने में पानी का न होना भयंकर पीड़ा दायक होता है, खैर वैकल्पिक तौर पर काम चलाऊ पानी की व्यवस्था की गयी और दो दिन बाद मोटर भी सही हो गया।


क्रमशः   


  





बुधवार, 29 अप्रैल 2020

उज्जैन, ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर की यात्रा भाग 3



यात्रा का तीसरा दिन 12/08/2018

ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर महादेव की यात्रा


आज यात्रा का तीसरा दिन था, जिसके लिए हम लोगों ने कल ही ओंकारेश्वर जाने के लिए बस में आरक्षण करा लिया था। आज सवेरे जल्दी उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर नीचे सड़क पर स्थित एक दुकान पर चाय पिया गया, बस वाले ने साढ़े आठ बजे का समय दिया था तो अभी करीब हम लोगों के पास डेढ़ घंटे का समय था, तो इसका सदुपयोग करने के लिए हम लोग पैदल ही हरि सिद्धी माता के मंदिर चले गए, माता हरि सिद्धी देवी के बारे में कहा जाता है कि ये विक्रमादित्य जी की कुल देवी थी, यहां पर उन्होंने माता की घोर तपस्या की थी एवं 11 बार अपना सिर काट कर माता के चरणों में चढ़ाया था। इस प्रकार इस मंदिर का विशेष महत्व है, मंदिर परिसर में ही दो दीप स्तंभ है जिसमें रात्रि के समय दीपक जलाया जाता है, उस समय यहां की छटा निराली होती है। मंदिर परिसर में कोने में एक बावड़ी है, वहां वैठने पर असीम शान्ति का अनुभव होता है, इस मंदिर के पीछे सन्तोषी माता एवं अगस्तेश्वर महादेव जी का मंदिर है, वैसे स्कन्द पुराण में भी इस मंदिर का उल्लेख है। माता का दर्शन करने के बाद सीधे सड़क पर चलते हुए बायें हाथ की तरफ ढलान से नीचे उतरने के बाद राम घाट की तरफ इशारा करते हुए एक बोर्ड लगा हुआ था, एवं कुछ आगे बढ़ने पर दाहिने हाथ में एक बहुत सुंदर मंदिर दिखाई पड़ा, हम लोग भी उसी तरफ चले गए। मंदिर बहुत ही सुंदर और विशाल था अन्दर जा कर दर्शन किया गया एवं भर्मण किया गया, अब तक 8 बज चुके थे, यहां से बस मिलने का स्थान थोड़ा दूर था तो हम लोग बस पकड़ने के लिए चल दिये, करीब 20 मिनट में हम लोग बस मिलने के स्थान पर पहुंच गए परंतु अभी वहां बस का पता ही नहीं था, बस वाले को फोन किया तो बताया दस मिनट में पहुंच रहा है, तब तक नजर सामने स्थिति एक रेस्टोरेंट पर पड़ी सोचा गया जब तक बस आ रही है तब तक कुछ नास्ता कर लिया जाय। रेस्टोरेंट में जाकर सभी लोगों ने अपने अपने पसंद का नास्ता किया । बस करीब 9 बजे आई और हम लोगों ने उसमें अपना स्थान ग्रहण कर लिया, सवा नौ बजे बस ओंकारेश्वर के लिए चल दी ।

ओंकारेश्वर की यात्रा

संयोग से मुझे खिड़की वाली सीट मिली थी, वैसे यात्रा चाहे बस की हो या ट्रेन की मेरा प्रयास खिड़की वाली सीट पाना होता है क्योंकि कोई भी घुमक्कड़ इस सुख से वंचित नहीं होना चाहता, घूमने के लिए हम जिस स्थान पर जाते हैं वहाँ तक पहुंचने का सफर का भी अपना आनंद होता है।
हम लोगों की बस रफ्तार पकड़ चुकी थी और मैं बाई तरफ खिड़की के किनारे बैठा अवंतिकापुरी का दर्शन कर रहा था, हममे से बहुत से लोगों ने टाइम मशीन के बारे सुना होगा जिसके द्वारा इंसान भूत में पहुंच जाता है, मैंने भी आँखे बंद करके भूत में जाने का प्रयास किया औऱ अभी कुछ ही दूर गया था कि ड्राइवर द्वारा लगाए गए ब्रेक के झटके के साथ वापस अपनी सीट पर आ गया। इस समय तक बस उज्जैन इंदौर मुख्य मार्ग पर दौड़ रही थी, बस के बाहर सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे थे, बीच बीच में मैं अपना मोबाइल निकाल कर कभी फोटो खीचता और कभी वीडियो बनाता, कभी आँखे बन्द करके विक्रमादित्य जी के समय में जाने का प्रयास करता, और कभी सोने का भी प्रयास करता, इस तरह मेरी बस ने यात्रा का आधा रास्ता पार कर लिया, अब ओ एक ढाबे पर खड़ी थी सभी यात्री उतर कर फ्रेश होने के बाद ढाबे की तरफ कुछ खाने के लिए जा रहे थे, हम लोग भी वहाँ लगी कुर्सियों पर बैठ गए और अपने अपने पसंद का नास्ता मंगाने लगे, वैसे इस ढाबे पर खाने पीने की चीजें कुछ महँगी थी लेकिन उसकी क्वालिटी बढिया थी, मैंने भी अपने एवं अपने साथ के लोगों के लिए समोसा, खस्ता एवं लस्सी मँगाया, नास्ता करने के बाद सभी लोग फिर बस में सवार हो गए।
बस अपने पूरे वेग से चल रही थी और अब पहाडी रास्ता शुरू हो चुका था, कहीं कहीं सकरे रास्तों से गुजरती बस और किनारे पड़ने वाली खाई को देखकर मन में रोमांच पैदा हो जाता, हम मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए रास्ते में पहाड़ का दृश्य आते ही प्रकृत के अनुपम सौंदर्य का आनन्द दिलों दिमाग पर छाने लगता है और व्यक्ति उस छंटा को अपने मन मस्तिष्क में बसा लेना चाहता है। सुन्दर सुन्दर दृश्यों को देखते हुए हम लोग अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे और अब ओंकारेश्वर से  कुछ ही दूर रह गए थे, काफी देर से बस में बैठने के कारण शरीर में अकड़न सी हो गई थी और अब मन यही चाह रहा था कि जल्दी से जल्दी अपने गंतव्य तक पहुंच जाए, कुछ देर की यात्रा के बाद हम लोग ओंकारेश्वर बस स्टेशन पर पहुंच गए, अब तक लगभग डेढ़ बज चुके थे और ड्राइवर ने उतरने के पहले ही हिदायत दे दी की आप लोग 4 बजे तक हर हाल में वापस आ जाये, क्योंकि बस 4 बजे वापसी के लिए प्रस्थान कर देगी,बस से उतरने के बाद ऑटो पकड़ कर हम लोग मंदिर तक पहुँचे, चूँकि ये यहाँ की पहली यात्रा थी इसलिए बहुत जानकारी नही थी, कुछ लोगों से पूछने पर पता चला कि पहले ममलेश्वर जी का मन्दिर पड़ता है और पुल पार कर उस पार ओंकारेश्वर जी का, तो पहले हम लोगों ने ममलेश्वर जी के दर्शन का सोच कर नीचे उतर गए और कुछ ही देर में मंदिर के समीप पहुंच गए। मंदिर के बाहर बने प्रसाद की दुकान से प्रसाद लिया गया और अपना सामान उसी दुकान पर रख दिया गया, मंदिर के अंदर पहुँचने पर एक पंडित जी ने पकड़ लिया और पूजा आदि कराने के लिए कहने लगे, हम लोगों ने भी सोचा कि पूजा तो करना ही है तो क्यों न इन्ही से करा लिया जाय, बात करने के बाद पंडित जी हम लोगों को मंदिर के अंदर लेकर गए और पूजा कराया, हम लोगों ने भगवान का दर्शन पूजन किया और गर्भ गृह से बाहर निकल आये। अब बारी थी मंदिर की भव्यता और वास्तुकला कला के अवलोकन की, मंदिर देखने में ही वहुत प्राचीन लगता है, वैसे ममलेश्वर का दूसरा नाम अमरेश्वर महादेव मंदिर भी है, यह एक पाँच मंजिला मंदिर है, मंदिर में बने दीवारों पर शिव स्त्रोत लिखा हुआ है तथा वहां 1063 AD अंकित है, वहां के लोगों से पूछने पर पता चला कि यह बहुत प्राचीन मंदिर है और इस समय पुरातत्व विभाग के अधीन है।
 ममलेश्वर जी का दर्शन करने के बाद हम लोग ओंकारेश्वर जी का दर्शन करने के लिए चल दिये इसके लिए पुल पार कर उस पार जाना पड़ता है, पुल के पास पहुंचे तो पता चला कि पुलिस वाले इधर से नही जाने दे रहे हैं, सिर्फ उधर से आने के लिए खुला है, ओंकारेश्वर जाने के लिए आगे से जाकर दूसरे पुल से जाने के लिये कह रहे थे, कुछ लोग पुलिस वालों के इधर उधर देखते ही  घुस के निकल जा रहे थे, हम लोगों ने भी प्रयास किया लेकिन सफलता नही मिली और कुछ देर बाद हम लोग दूसरे पुल की तरफ चल दिये जो कि वहां से लगभग एक किलोमीटर दूर था, नर्मदा नदी के किनारे चलते हुए दूसरे पुल तक पहुंचने में करीब आधा घंटा लग गया।
अब आइये थोड़ा ओंकारेश्वर महादेव के बारे में जान लेते हैं, यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में चौथे स्थान पर आता है, ऐसी मान्यता है कि यहां भगवान शिव सारे ब्रह्माण्ड का भर्मण करने के बाद रात्रि शयन करने के लिए आते हैं, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का कई पुराणों में भी उल्लेख मिलता है, नर्मदा नदी के बीच में ॐ टापू पर बसे होंने के कारण ओम्कारेश्वर के नाम से जाना जाता हैं, ऐसा भी कहा जाता है कि ऊपर से देखने पर ॐ के आकार का दिखाई देता है, यहाँ ओम्कारेश्वर महादेव के अतिरिक्त और भी कई मंदिर है, या यूं कहें कि मंदिरों का समूह है, यहाँ आने वाले कुछ लोग यहाँ की परिक्रमा भी करते हैं, लगभग 16 किलोमीटर का परिक्रमा पथ है, और परिक्रमा करने पर लगभग सभी मंदिरों के दर्शन हो जाते हैं, कहीं कहीं गर्भ गृह की परिक्रमा की जाती है और कही कही पूरे पवित्र क्षेत्र का किया जाता है।
 ओंकारेश्वर महादेव का मंदिर भी एक पाँच मंजिला भवन है।
हम लोग पुल पार करके ओम्कारेश्वर जी पहुंचे और सीधे दर्शन के लिए लाइन में लग गए, भीड ज्यादा होने के कारण लाइन बहुत दूर से लगी थी, कुछ देर तक तो लाइन बढ़ती रही लेकिन मंदिर से थोड़ा पहले जाकर रुक गई, पता किया गया तो मालुम हुआ कि अब मंदिर बंद हो चुका है और अब ये 4 बजे खुलेगा, अभी लगभग पौने तीन बजे थे और 4 बजे तक हम लोगों को बस स्टैंड पर पहुचना था क्योंकि ड्राइवर ने पहले ही वापसी का समय बता दिया था, अब तो दर्शन हो पाना मुश्किल लग रहा था, कुछ देर खड़े रहने के बाद लाइन से बाहर आ गए, इस बीच कई पंडों ने 300 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से दर्शन कराने का प्रस्ताव दिया, लेकिन सभी लोगों का एक राय ना हो पाने के कारण ओ भी नहीं हो पाया। आज भगवान के द्वार पर आकर दर्शन न कर पाने का बहुत दुख हो रहा था, और इन सब के पीछे का कारण समय का सही तरीके से प्रबंधन ना हो पाना था, सभी लोगों ने अपने आराध्य देव को मन ही मन में प्रणाम किया और फिर कभी आने का निश्चय करके वहां से वापस हो लिए, वापसी में कुछ लोगों की इच्छा नर्मदा नदी में स्नान करने की थी लेकिन गन्दगी को देखते हुए सबने स्थगित कर दिया, कुछ देर हम लोग नदी के किनारे बैठ कर नौका विहार कर रहे लोगों को देखते रहे, इस बीच मोबाइल से कुछ फोटो भी खीचा गया, घड़ी की सूई धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी और इस समय साढ़े तीन बज रहे थे, अब हम लोगों को बस स्टैंड पहुचना था क्योंकि यहाँ से वहाँ जाने में आधे घंटे लग ही जाने थे, हम लोगों ने एक बार और ओंकारेश्वर जी का ध्यान किया और दर्शन ना कर पाने के लिए क्षमा मांगी और बस स्टैंड की तरफ चल दिये, पुल पार करने के बाद ऑटो पकड़ा और कुछ ही देर में बस के पास पहुंच गए। इस यात्रा में हम लोगों से गलती ये हुई कि पहले यदि हम लोग ओंकारेश्वर जी का दर्शन कर लेते उसके बाद ममलेश्वर जी का दर्शन करते तो दोनों जगह आराम से दर्शन मिल जाता, क्योंकि ममलेश्वर जी का मंदिर दिन में नहीं बंद होता है, लेकिन ये बात हम लोगों को पहले नही था, खैर जैसी प्रभु की इच्छा, हमारे बस के अन्य यात्रियों ने ऐसा ही किया था।
बस में बैठने के कुछ ही देर बाद बस चल दी, वापसी में हम लोगों के मन में दर्शन ना कर पाने का बहुत दुख था इस कारण सभी लोग अपनी अपनी सीट पर बैठ कर चुप चाप चलती हुई बस से दिखने वाले दृश्यों को देखकर अपने दुख को कम करने की कोशिश कर रहे थे, वापसी में बस फिर उसी ढाबे पर रुकी, चाय नास्ता करने के बाद फिर बस में सवार हुए और इस प्रकार
हम लोगों की बस करीब साढ़े सात बजे हरि सिद्धी माता के मंदिर के पास पहुंच गई सब लोग वहीं उतर गए क्योंकि हम लोगों का धर्मशाला यहां से पास था, बस से उतर कर हम लोग अपने कमरे पर आ गए और फ्रेस हो कर आज के यात्रा के बारे में में बात चीत करने लगे, कुछ देर आराम करने के बाद लगभग नौ बजे हम लोग खाना खाने नीचे स्थित होटल में गये, वहाँ सभी लोगों ने अपना मन पसन्द भोजन किया और वापस कमरे पर आकर सोने की तैयारी करने लगे, इसी बीच कल के दिन की यात्रा के बारे में भी विचार विमर्श हुआ, कल उज्जैन में स्थित बाकी मंदिरों का दर्शन करने का कार्यक्रम बना, इस प्रकार तीसरे दिन की यात्रा समाप्त हुई।

उज्जैन में स्थित अन्य मंदिरों की यात्रा के लिए  क्लिक करें।
https://harilko.blogspot.com/?m=1












सोमवार, 27 अप्रैल 2020

उज्जैन, ओम्कारेश्वर एवं ममलेश्वरकी यात्रा भाग -2

यात्रा का दूसरा दिन 11/08/2018
महाकाल जी का दर्शन एवं उज्जैन भर्मण


आज यात्रा का दूसरा
दिन था, सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर सभी लोग महाकाल जी का दर्शन करने के लिये चल दिये । मंदिर के बाहर ही प्रसाद की दुकान पर अपना सामान रखा गया एवं वहीं से प्रसाद आदि लेकर दर्शन के लिए लाइन में लग गए, लाइन काफी लंबी थी परंतु दर्शन की अभिलाषा में सारी तकलीफ कम लगती है, हम लोग महाकाल जी का जैकारा लगाते हुए आगे बढ़ते रहे, करीब एक घंटे की यात्रा के बाद हम लोग मंदिर प्रांगण में पहुंचे अब तो दर्शन करने उत्सुकता में भाव विभोर हो मन को महाकाल जी के चरणों में लगा कर चलते हुए कब उनके सामने पहुँच गए पता ही नहीं चला, इस समय भीड़ और बढ़ गई और सभी लोग दर्शन का अधिकतम लाभ लेने के लिए धक्का मुक्की करने लगे ओ तो पुलिस वाले व्यवस्था बनाने में मदद करते हैं नही तो सब एक दूसरे के ऊपर चढ़ के निकल जाए।
हम लोगों ने भी महाकाल जी का दर्शन किया एवं आगे जाकर हाल में बैठ गए और भरपूर दर्शन एवं पूजा अर्चना किया गया, उसके बाद मंदिर परिसर में स्थित अन्य मंदिरों का दर्शन किया गया एवं प्रसाद आदि लिया गया। मंदिर परिसर में बैठकर काफी देर तक मंदिर की भव्यता का आनन्द लिया गया, वहां की वास्तु कला भी काफी उत्तम है। यह एक परम आनन्द का छड़ था एक विशेष प्रकार की शान्ति का अनुभव हो रहा था, काफी देर तक निहारने एवं सभी मंदिरों का दर्शन करने के बाद बाहर निकल कर प्रसाद की दुकान पर रखा हुवा सामान लिया गया, अब तक लगभग 12 बज चुके थे, शरीर में ईंधन की कमी महसूस हो रही थी तो आगे चलकर एक जलपान की दुकान पर रुक कर पकौडी एवं चाय पिया गया, उसके बाद सड़क पर टहलते हुए अपने अड्डे की तरफ निकल दिये। रास्ते में एक जगह महाकाल जी का भंडारा चल रहा था, लोगों की इच्छा हुई तो अन्दर जाकर प्रसाद लिया गया, यहां प्रसाद के रूप में पूरा भोजन ही परोसा जा रहा था जिसमें पुड़ी, सब्जी एवं स्वादिष्ट खीर थी। प्रसाद खाने के बाद अब भोजन की आवश्यकता ही नहीं थी तो सीधे कमरे पर आकर आराम किया गया।

विश्राम के बाद उज्जैन की सैर


कुछ देर विश्राम करने के बाद फिर हम लोग कमरे से बाहर निकले और एक दुकान पर चाय पिया गया उसके बाद सर्वप्रथम विक्रम टीला गये, वहां मुख्य द्वार पर पहुचते ही बचपन मे सुनी विक्रमादित्य की कहानी याद आ गई, आज ओ सपना साकार हो गया जिसके बारे में बचपन मे हम लोगों ने अनेकों किस्से सुने थे, आज उन्हीं विक्रमादित्य के नगर में आकर सब कुछ देखने का सौभाग्य मिला। विक्रम टीला के अन्दर जा कर सचमुच गौरव का अनुभव हुआ, वहाँ लगे सूचना पत्रकों को पढ़कर वचपन में सुनी सारी कहानियां एक बार पुनः स्मरण हो गई, काफी देर तक वहाँ वैठने के बाद फोटो आदि खीचा गया और विक्रम टीला के पीछे स्थिति तालाब की खूबसूरती शाम के समय अतुलनीय थी।
विक्रम टीला घूमने के बाद हम लोग बाहर निकल आये, अब कल के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार हो रही थी, सभी लोगों की सहमति होने के बाद तय हुआ कि हम लोग कल ओंकारेश्वर जी का दर्शन करने के लिए जाएंगे, कई जगह पूछने पर पता चला कि वहाँ जाने के लिए टैक्सी और प्राइवेट बसें चलती हैं जो सुबह जाती है और शाम तक वापस आ जाती हैं। एक दुकान वाले से पूछने पर पता चला कि बड़े गणेश जी के मंदिर के पास वहां जाने के लिए बस में बुकिंग होती हैं। उसके बाद हम लोग बड़े गणेश मंदिर गए और दर्शन करने के बाद बस की बुकिंग का पता किया गया तो पता चला वहीं एक दुकान पर उसकी बुकिंग होती है, हम लोगों ने वहां पहुंच कर कल के लिए ओंकारेश्वर जाने के लिए बस में अपनी सीट बुक करा ली। इस बीच कुछ लोगों ने उज्जैन की सड़कों पर मिलने वाले खाद्य पदार्थों का आनंद उठाया उसके बाद हम लोग माता हर सिद्धी का दर्शन करने गये, वहां भी लगभग दो घंटे  व्यतीत किया गया अब तक रात के नौ बज चुके थे, सभी लोग एक होटल पर पहुंचे और वहाँ अपना मन पसंद भोजन किया गया, उसके बाद कमरे पर आकर बात चीत करते हुए सो गए, तो इस प्रकार यात्रा का दूसरा दिन समाप्त हुआ।

कल ओंकारेश्वर की यात्रा होगी





बुधवार, 22 अप्रैल 2020

उज्जैन, ओम्कारेश्वर एवं ममलेश्वर यात्रा भाग-1

उज्जैन, ओम्कारेश्वर एवं ममलेश्वरकी  यात्रा भाग -1यात्रा का दिनाँक 10 अगस्त 2018

बहुत दिनों से उज्जैन जाने की इच्छा हो रही थी, महाकाल के दर्शन की कामना लिए उज्जैन जाने की ट्रेन में जून के महीने में ही आरक्षण करा लिया था, इसकी चर्चा एक बार मैंने अपने मामा जी से की तो ओ भी तैयार हो गए उन्होंने अपना एवं मौसी जी एवं उनके लड़के का भी आरक्षण उसी ट्रेन में 10 अगस्त 2018 में उज्जैन जाने के

शनिवार, 25 जनवरी 2020

मथुरा , भरतपुर , मेंहदीपुर बालाजी , आगरा दर्शन भाग - 6

मथुरा , वृन्दावन , मेंहदीपुर बालाजी , आगरा की यात्रा शुरू से पढ़ने के लिए -  यहाँ क्लिक करे


 यात्रा का  दिनांक 14 अगस्त 2019


मथुरा जी से जिस ट्रैन में हम लोगों का आरक्षण था वह करीब तीन घंटे की देरी से आयी, हम लोगों ने अपने अपने बर्थ पर डेरा जमाया और अलार्म लगा कर सो गए, करीब साढ़े तीन बजे ट्रैन बांदीकुई पहुंच गई, शायद कुछ देर पहले वहां बारिश हुई थी जिसके कारन स्टेशन के बाहर थोड़ा पानी लगा था, स्टेशन से बाहर  निकल कर हम लोगों ने एक जगह चाय पी  उसके बाद एक मार्शल में बैठ कर अपने आराध्य बजरंग बली के धाम मेंहदीपुर बालाजी पहुंच गए, मार्शल से उतरने के बाद एक दो होटल देखा गया लेकिन सही नहीं लगा तो थोड़ा और अंदर गए तो एक धर्मशाला मिला, पता करने पर एक बड़ा कमरा खाली था जिसको हम लोगों ने बुक कर लिया और सामान रखकर नित्यकर्म करने के बाद नहा धोकर बाला जी के दर्शन के लिए निकल लिए, इस समय करीब ६ बज रहे थे, मंदिर के बाहर से ही एक जगह प्रसाद लिया गया और लाइन में लग गए, चूकि ये हम सभी लोगों  का बालाजी आने का पहला अवसर था इसलिए बहुत जानकारी नहीं थी, कुछ लोग अपनी मनौती के लिए अरदास एवं सवा मणि भी करा रहे थे, किन्तु हम लोगों पर बजरंगबली की कृपा हमेशा बनी रहती है इसलिए हम लोग   सिर्फ दर्शन करने की ही इच्छा से  लाइन में लग गए ।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

मथुरा , भरतपुर , मेंहदीपुर बालाजी , आगरा दर्शन भाग - 5

मथुरा , भरतपुर , मेंहदीपुर बालाजी , आगरा दर्शन शुरू से पढ़ने के लिए - यँहा क्लिक करें 


कल का दिन हम लोगों केलिए काफी थकान भरा रहा लेकिन सब कुछ अच्छा रहा, अब आज हम लोग वृन्दावन में वैष्णो देवी मंदिर, इस्कान मंदिर, बांके विहारी मंदिर, काँच का मंदिर आदि का दर्शन करते हुए गोकुल से आगे चौरासी खम्भा एवं पुराने गोकुल जायेंगे। 
सुबह उठने के बाद सभी लोग नहा धोकर फ्रेश हो गए एवं कमरे पर ही चाय पी  गयी   उसके बाद नीचे  सड़क पर आकर टैक्सी का इंतजाम किया गया, एक टैक्सी वाला 1200  रूपये में ये सारे स्थान घुमाने के लिए तैयार हो गया, सभी लोग गाड़ी में बैठ गए और सबसे पहला पड़ाव था वैष्णों माता मंदिर। 

विंध्याचल की यात्रा

इस यात्रा को शुरु से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें  विंध्याचल की यात्रा आज यात्रा का तीसरा दिन था, दो दिन प्रयागराज में स्नान एवं भर्मण के बा...