पहला लाइक
एक अनकहा रिश्ता
अध्याय 1 : एक छोटी-सी शुरुआत
रिया की उम्र तब सिर्फ बीस वर्ष थी।
उम्र का वह पड़ाव, जब इंसान के पास सपने ज्यादा होते हैं और अनुभव कम। जब हर नई चीज आकर्षित करती है, हर तारीफ खुशी देती है और भविष्य किसी खुले हुए आसमान की तरह दिखाई देता है।
रिया मुंबई में रहती थी। उसके पिता बैंक में नौकरी करते थे और मां एक स्कूल में शिक्षिका थीं। रिया पढ़ाई में अच्छी थी, लेकिन उसकी असली रुचि किताबों, तस्वीरों और लिखने में थी।
उसे बचपन से ही छोटी-छोटी बातों को शब्दों में ढालने की आदत थी।
बारिश होती तो वह खिड़की के पास बैठकर लिखती—
"बारिश सिर्फ आसमान से गिरने वाला पानी नहीं है, कभी-कभी यह उन लोगों की याद भी होती है जिन्हें हम भूलना चाहते हैं।"
मां उसकी डायरी पढ़तीं और मुस्कुरा देतीं।
"तू इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी-बड़ी बातें कहां से सीख गई?"
रिया हंसकर कहती—
"मां, बातें मैं नहीं लिखती, बातें अपने आप आ जाती हैं।"
समय बदला।
मोबाइल आया।
इंटरनेट आया।
और फिर सोशल मीडिया।
कॉलेज के अंतिम वर्ष में रिया ने देखा कि उसके आसपास लगभग हर व्यक्ति सोशल मीडिया पर कुछ न कुछ कर रहा था।
कोई वीडियो बनाता था।
कोई गाने गाता था।
कोई यात्रा की तस्वीरें डालता था।
कोई खाना बनाना सिखाता था।
रिया ने भी एक दिन सोचा—
"मैं क्या कर सकती हूं?"
उसे जवाब मिला—
"मैं लिख सकती हूं।"
बस उसी दिन उसने अपना एक सोशल मीडिया पेज बना लिया।
नाम रखा—
"दिल से रिया"
पहली पोस्ट डालने से पहले वह लगभग आधे घंटे तक सोचती रही।
क्या लिखे?
कैसी तस्वीर लगाए?
लोगों को पसंद आएगा या नहीं?
अंत में उसने अपनी खिड़की से बाहर की एक साधारण सी तस्वीर खींची। शाम का समय था। सूरज ढल रहा था।
उसने नीचे लिखा—
"हर शाम उदास नहीं होती, कुछ शामें बस हमें यह याद दिलाती हैं कि हर अंत के बाद एक नई सुबह आती है।"
पोस्ट डाल दी।
फिर इंतजार शुरू हुआ।
पांच मिनट।
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
दस मिनट।
फिर भी कुछ नहीं।
रिया ने मोबाइल रखा।
फिर उठाया।
फिर नोटिफिकेशन चेक किया।
एक लाइक।
वह मुस्कुराई।
बीस मिनट बाद तीन लाइक।
एक घंटे बाद पांच लाइक और दो कमेंट।
रिया की खुशी का ठिकाना नहीं था।
उसने लाइक्स की सूची खोली।
सबसे ऊपर एक नाम था—
विनय शर्मा।
वह नाम उसके लिए बिल्कुल अनजान था।
न कोई कॉमन फ्रेंड।
न कोई परिचित।
न कोई पहचान।
उसने सोचा—
"कोई सामान्य फॉलोअर होगा।"
और मोबाइल रख दिया।
उसे नहीं पता था कि यह नाम आने वाले कई वर्षों तक उसकी जिंदगी का हिस्सा बना रहेगा।
अध्याय 2 : हर बार पहला नाम
अगले दिन रिया ने दूसरी पोस्ट डाली।
इस बार उसने मां के हाथ की चाय की तस्वीर डाली।
नीचे लिखा—
"मां के हाथ की चाय में चीनी कितनी है, यह कभी पता नहीं चलता। क्योंकि उसमें स्वाद से ज्यादा अपनापन घुला होता है।"
कुछ देर बाद उसने मोबाइल खोला।
पहला लाइक—
विनय शर्मा।
रिया ने ध्यान नहीं दिया।
तीसरे दिन भी।
पहला लाइक—
विनय शर्मा।
चौथे दिन भी।
पांचवें दिन भी।
अब रिया को हल्की जिज्ञासा होने लगी।
"ये कौन हैं जो हर बार सबसे पहले मेरी पोस्ट देख लेते हैं?"
उसने पहली बार विनय शर्मा की प्रोफाइल खोली।
प्रोफाइल बहुत साधारण थी।
एक तस्वीर में लगभग पचास वर्ष के व्यक्ति दिखाई दे रहे थे।
हल्की सफेद होती मूंछें।
आंखों पर चश्मा।
चेहरे पर शांत मुस्कान।
कपड़े भी बहुत साधारण।
रिया ने तस्वीर देखकर कहा—
"लगते तो किसी के पापा जैसे हैं।"
वह हंस पड़ी।
प्रोफाइल पर ज्यादा तस्वीरें नहीं थीं।
कुछ धार्मिक पोस्ट।
कुछ सामाजिक विषय।
कुछ राजनीतिक विचार।
और कुछ पुरानी फिल्मों के गाने।
रिया को सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब उसने देखा कि विनय शर्मा ने उसकी कई पोस्ट शेयर की थीं।
लेकिन कभी उसे टैग नहीं किया था।
बस चुपचाप शेयर किया था।
रिया ने ज्यादा नहीं सोचा।
सोशल मीडिया की दुनिया में लोग बहुत कुछ करते हैं।
और वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई।
लेकिन विनय शर्मा वहीं बने रहे।
हर पोस्ट पर।
लगभग हर बार सबसे पहले।
अध्याय 3 : दस साल की चुप्पी
समय बीतता गया।
पहले महीने।
फिर साल।
फिर कई साल।
रिया की जिंदगी बदलती गई।
कॉलेज खत्म हुआ।
नौकरी मिली।
नई जगह काम शुरू किया।
पुराने दोस्त धीरे-धीरे दूर होते गए।
कुछ नए दोस्त आए।
कुछ रिश्ते बने।
कुछ टूटे।
कभी किसी से प्रेम हुआ।
कभी दिल टूटा।
कभी प्रमोशन मिला तो खुशियां मनाईं।
कभी ऑफिस की राजनीति से परेशान होकर रात-रात भर रोई।
लेकिन इन सबके बीच एक चीज लगातार बनी रही—
उसका सोशल मीडिया पेज।
वह लिखती रही।
कभी खुशी पर।
कभी दर्द पर।
कभी प्रेम पर।
कभी रिश्तों पर।
कभी अकेलेपन पर।
उसकी बातें लोगों के दिलों तक पहुंचने लगीं।
धीरे-धीरे उसके फॉलोअर्स बढ़ने लगे।
हजार।
दस हजार।
पचास हजार।
एक लाख।
फिर लाखों।
अब रिया सिर्फ एक साधारण लड़की नहीं रही थी।
लोग उसे जानते थे।
उसके शब्दों को शेयर करते थे।
उसकी पोस्ट का इंतजार करते थे।
लेकिन लाखों लोगों के बीच एक नाम ऐसा था जो कभी नहीं बदला।
विनय शर्मा।
कभी-कभी रिया जानबूझकर पोस्ट डालकर देखती।
फिर कुछ देर बाद नोटिफिकेशन खोलती।
और मन ही मन मुस्कुराती—
"देखते हैं, आज भी सबसे पहले यही आते हैं या नहीं?"
और स्क्रीन पर अक्सर वही नाम होता।
विनय शर्मा ने आपकी पोस्ट को लाइक किया।
कभी साधारण लाइक।
कभी दिल वाला निशान।
कभी बहुत महीनों बाद एक छोटा सा कमेंट—
"बहुत अच्छा लिखा है।"
बस।
कोई अतिरिक्त बात नहीं।
कोई निजी संदेश नहीं।
कोई दोस्ती की मांग नहीं।
कोई फोटो भेजना नहीं।
कोई मिलने की इच्छा नहीं।
बस एक मौन उपस्थिति।
अध्याय 4 : क्या कोई चुपचाप किसी का इंतजार करता है?
एक दिन ऑफिस में रिया की सहकर्मी ने उससे पूछा—
"तुम्हारी पोस्ट पर इतने लोग कमेंट करते हैं, तुम जवाब क्यों नहीं देती?"
रिया ने कहा—
"सबको जवाब देना संभव नहीं है।"
"लेकिन कभी किसी से दोस्ती करने का मन नहीं करता?"
रिया ने मुस्कुराकर कहा—
"सोशल मीडिया की दोस्ती पर ज्यादा भरोसा नहीं है मुझे।"
उसकी सहकर्मी ने कहा—
"लेकिन कभी-कभी अनजान लोग भी अपने बन जाते हैं।"
रिया ने बात बदल दी।
उस रात उसने अपनी नई पोस्ट डाली।
पोस्ट थी—
"कुछ लोग हमारी जिंदगी में बहुत बातें करके जगह नहीं बनाते, बल्कि चुप रहकर हमारी आदत बन जाते हैं।"
पोस्ट डालने के बाद अचानक उसे विनय शर्मा याद आ गए।
उसने खुद से कहा—
"अरे! मैं भी न जाने किसके बारे में सोचने लगी।"
कुछ देर बाद उसने लाइक्स देखे।
सबसे ऊपर—
विनय शर्मा ❤️
रिया मुस्कुरा दी।
उसे नहीं पता था कि उस मुस्कान के पीछे एक आदत बन चुकी थी।
अध्याय 5 : एक दिन पहला लाइक नहीं आया
रिया अब बत्तीस वर्ष की हो चुकी थी।
वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रही थी।
उसकी जिंदगी व्यस्त थी।
सुबह जल्दी उठना।
ऑफिस जाना।
मीटिंग्स।
प्रेजेंटेशन।
घर लौटना।
और फिर सोशल मीडिया।
एक शाम वह बहुत थकी हुई थी।
ऑफिस में उसका दिन खराब रहा था।
बॉस ने उसकी मेहनत की आलोचना की थी।
एक प्रोजेक्ट में समस्या आ गई थी।
वह घर आई और बालकनी में बैठ गई।
बाहर बारिश हो रही थी।
उसने बारिश की एक तस्वीर ली और लिखा—
"जब मन बहुत थक जाए तो किसी से यह मत पूछो कि मुझे क्या करना चाहिए। बस किसी ऐसे व्यक्ति के पास बैठ जाओ जो तुम्हें बिना सवाल किए सुन सके।"
पोस्ट डाल दी।
कुछ देर बाद उसने मोबाइल खोला।
पहला लाइक किसी और का था।
रिया ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
दस मिनट बाद फिर देखा।
बीस लाइक।
पचास लाइक।
सौ लाइक।
लेकिन—
विनय शर्मा नहीं।
रिया ने दोबारा देखा।
फिर देखा।
फिर पूरी सूची देखी।
नहीं।
उसने मोबाइल रख दिया।
मन में आया—
"आज शायद व्यस्त होंगे।"
अगले दिन उसने फिर पोस्ट डाली।
इस बार भी वह अनजाने में इंतजार करती रही।
लेकिन विनय शर्मा नहीं आए।
तीसरे दिन भी नहीं।
चौथे दिन भी नहीं।
एक सप्ताह गुजर गया।
रिया को अजीब लगने लगा।
उसने खुद को समझाया—
"कोई बात नहीं, इंसान है, हर समय सोशल मीडिया पर थोड़े रहेगा।"
लेकिन उसका मन मानने को तैयार नहीं था।
वह हर पोस्ट के बाद लाइक्स की सूची खोलती।
नाम ढूंढती।
विनय शर्मा।
लेकिन वह नाम नहीं था।
अध्याय 6 : एक छोटी-सी कमी
दो सप्ताह बीत गए।
फिर एक महीना।
रिया के पेज पर पहले की तरह प्रतिक्रियाएं आती रहीं।
लाखों लोग जुड़े थे।
हजारों लाइक आते।
सैकड़ों कमेंट आते।
लेकिन एक कमी थी।
बहुत छोटी।
इतनी छोटी कि किसी दूसरे व्यक्ति को शायद दिखाई भी न दे।
लेकिन रिया को दिखाई देती थी।
हर पोस्ट के बाद उसे लगता जैसे किसी जगह खालीपन रह गया हो।
एक दिन उसने अपनी सहेली निधि से कहा—
"निधि, क्या तुम्हें कभी किसी की आदत पड़ गई है बिना उससे बात किए?"
निधि ने हंसकर कहा—
"क्या बात है? कोई नया प्रेमी मिल गया है क्या?"
रिया ने नाराज होकर कहा—
"नहीं, मैं गंभीर बात कर रही हूं।"
"तो बताओ।"
रिया कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
"मान लो कोई व्यक्ति कई साल तक रोज तुम्हारी जिंदगी में किसी न किसी तरह मौजूद रहे। कभी बात न करे, बस मौजूद रहे। और अचानक गायब हो जाए।"
निधि ने कहा—
"तो कमी महसूस होगी।"
"लेकिन अगर वह व्यक्ति अजनबी हो तो?"
निधि ने उसकी तरफ देखा।
"रिया, अजनबी होना और अपरिचित होना अलग बात है।"
रिया चुप हो गई।
उस रात वह बहुत देर तक यह सोचती रही।
क्या विनय शर्मा उसके लिए अजनबी थे?
वह उन्हें नहीं जानती थी।
लेकिन दस वर्षों से उनके नाम को जानती थी।
उनकी तस्वीर देखी थी।
उनकी पसंद देखी थी।
उनकी चुप्पी को पहचानती थी।
क्या यह जानना नहीं था?
अध्याय 7 : वह सपना
एक रात रिया ने अजीब सपना देखा।
वह एक बड़े सभागार में खड़ी थी।
हजारों लोग उसके सामने थे।
सब उसके लिए तालियां बजा रहे थे।
कोई कह रहा था—
"रिया, आपकी पोस्ट ने मेरी जिंदगी बदल दी।"
कोई कह रहा था—
"आप बहुत अच्छा लिखती हैं।"
कोई उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहता था।
बहुत भीड़ थी।
बहुत आवाजें थीं।
लेकिन अचानक रिया को लगा कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति वहां नहीं है।
वह भीड़ में ढूंढने लगी।
एक-एक चेहरा देखती गई।
फिर हॉल के एक कोने में उसे एक व्यक्ति दिखाई दिया।
सफेद बाल।
चश्मा।
हल्की मुस्कान।
वही चेहरा।
विनय शर्मा।
रिया तेजी से उनके पास गई।
"आप कहां चले गए थे?"
विनय मुस्कुराए।
"कहीं नहीं।"
"फिर मेरी पोस्ट पर लाइक क्यों नहीं किया?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
"तुम्हें फर्क पड़ता है?"
रिया चुप हो गई।
वह कुछ नहीं बोल पाई।
विनय ने कहा—
"तुम्हारे पास लाखों लोग हैं रिया। एक आदमी के चले जाने से क्या फर्क पड़ेगा?"
रिया की आंखें भर आईं।
"पड़ता है।"
विनय ने पहली बार उसकी आंखों में देखा।
"क्यों?"
रिया ने धीरे से कहा—
"मुझे नहीं पता।"
विनय ने मुस्कुराकर कहा—
"कुछ रिश्तों के जवाब नहीं होते।"
इतना कहकर वह पीछे हटने लगे।
रिया घबरा गई।
"रुकिए!"
लेकिन वह धीरे-धीरे धुंध में गायब होने लगे।
रिया चिल्लाई—
"विनय जी!"
तभी अलार्म बज उठा।
सुबह के छह बजे थे।
रिया की आंख खुल गई।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
उसने तुरंत मोबाइल उठाया।
पहला काम—
सोशल मीडिया खोलना।
वह जानती थी कि यह सपना था।
फिर भी उसके अंदर एक उम्मीद थी।
शायद विनय शर्मा वापस आ गए हों।
लेकिन स्क्रीन पर उनका कोई नाम नहीं था।
रिया ने आंखें बंद कर लीं।
अध्याय 8 : खोज
दो महीने गुजर चुके थे।
अब रिया के लिए यह सिर्फ जिज्ञासा नहीं रह गई थी।
उसे चिंता होने लगी थी।
उसने विनय शर्मा की प्रोफाइल खोली।
आखिरी पोस्ट लगभग दो महीने पुरानी थी।
उसके बाद कुछ नहीं।
न कोई लाइक।
न कोई शेयर।
न कोई नई तस्वीर।
रिया ने प्रोफाइल को ऊपर से नीचे तक देखना शुरू किया।
पुरानी तस्वीरें।
पुराने पोस्ट।
पुराने कमेंट।
वह कई साल पीछे चली गई।
अचानक एक तस्वीर मिली।
विनय शर्मा किसी पारिवारिक समारोह में थे।
तस्वीर के नीचे किसी ने लिखा था—
"इंदौर वाले भैया हमेशा मुस्कुराते रहें।"
रिया ने पहली बार जाना—
इंदौर।
उसने और खोजा।
एक पुरानी पोस्ट में एक मोबाइल नंबर था।
शायद किसी सामाजिक कार्यक्रम के लिए।
नंबर के साथ लिखा था—
विनय शर्मा, इंदौर।
रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने तुरंत नंबर नोट कर लिया।
मोबाइल में सेव किया।
नाम लिखा—
Vinay Ji
अब उसके पास एक रास्ता था।
लेकिन रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं थी।
अध्याय 9 : एक नंबर और हजार सवाल
रिया कई दिनों तक उस नंबर को देखती रही।
कभी कॉल करती।
रिंग जाने से पहले काट देती।
फिर सोचती—
"क्या कहूंगी?"
"नमस्ते, मैं रिया हूं।"
फिर?
"आप मुझे जानते हैं?"
फिर?
"आपने मेरी पोस्ट लाइक करना क्यों बंद कर दिया?"
यह सोचकर उसे खुद पर हंसी भी आती और शर्म भी।
एक दिन उसने नंबर डिलीट करने का फैसला किया।
फिर नहीं किया।
उसने फोन को हाथ में लेकर कहा—
"रिया, तुम पागल हो रही हो।"
लेकिन दिल ने कहा—
"अगर कुछ हुआ होगा और तुमने कभी जानने की कोशिश नहीं की तो?"
उसने तुरंत मोबाइल रख दिया।
यह विचार उसे डरा गया।
अध्याय 10 : वह रविवार
रविवार की सुबह थी।
निधि अपने माता-पिता के घर गई हुई थी।
रिया फ्लैट में अकेली थी।
उसने चाय बनाई।
बालकनी में बैठी।
सामने सड़क पर लोग अपने काम में जा रहे थे।
किसी को नहीं पता था कि एक लड़की अपने मोबाइल में एक नंबर को देखते हुए कितनी बड़ी लड़ाई लड़ रही है।
उसने आंखें बंद कीं।
गहरी सांस ली।
और कॉल कर दिया।
एक रिंग।
दो रिंग।
तीन रिंग।
रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह कॉल काटने ही वाली थी कि आवाज आई—
"हेलो?"
रिया चुप हो गई।
आवाज किसी युवा लड़के की थी।
"हेलो?"
रिया ने धीरे से पूछा—
"क्या मैं विनय शर्मा जी से बात कर सकती हूं?"
कुछ क्षण चुप्पी।
फिर प्रश्न—
"आप कौन?"
रिया घबरा गई।
"जी... मैं... उनकी एक परिचित हूं।"
"नाम?"
"रिया।"
दूसरी तरफ फिर चुप्पी।
फिर लड़के ने पूछा—
"क्या आप सोशल मीडिया वाली रिया हैं?"
रिया का दिल धक से रह गया।
"जी।"
लड़के की आवाज अचानक गंभीर हो गई।
"मैं रोहन बोल रहा हूं। विनय शर्मा जी मेरा नाम लेकर कभी-कभी आपकी बातें करते थे।"
रिया को राहत मिली।
"अच्छा... तो उनसे बात करा दीजिए।"
इस बार चुप्पी पहले से ज्यादा लंबी थी।
रिया ने कहा—
"हेलो?"
रोहन ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
"मैडम... आपको शायद पता नहीं है।"
रिया के हाथ कांपने लगे।
"क्या?"
"पापा अब नहीं रहे।"
समय रुक गया।
हवा रुक गई।
सड़क की आवाजें रुक गईं।
रिया का शरीर जैसे पत्थर हो गया।
"क्या कहा आपने?"
"दो महीने पहले... अचानक हार्ट अटैक आया था।"
मोबाइल उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया।
फोन में दूसरी तरफ से आवाज आती रही—
"हेलो? मैडम? सुन रही हैं?"
लेकिन रिया सुन नहीं रही थी।
उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
धीरे-धीरे।
फिर तेजी से।
फिर वह फूटकर रोने लगी।
उसके मुंह से अनायास निकला—
"विनय जी..."
और फिर—
"विनय जी... आप कहां चले गए?"
अध्याय 11 : एक अजनबी का दुख
रिया को खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह इतना क्यों रो रही है।
उसने उन्हें कभी देखा नहीं।
कभी उनके साथ बैठी नहीं।
कभी उनका जन्मदिन नहीं मनाया।
कभी उन्हें फोन नहीं किया।
कभी उनकी आवाज तक नहीं सुनी।
फिर यह दर्द कैसा था?
क्यों उसे लग रहा था जैसे उसके जीवन का कोई अपना व्यक्ति चला गया हो?
फोन अब भी चालू था।
रोहन ने धीरे से कहा—
"मैडम, आप ठीक हैं?"
रिया ने कांपती आवाज में पूछा—
"आपके पापा... मेरे बारे में क्या कहते थे?"
रोहन कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
"आप सच में नहीं जानतीं?"
रिया ने कहा—
"नहीं।"
रोहन ने गहरी सांस ली।
"मेरे पापा बहुत अकेले रहते थे। मां को गुजरे सात साल हो चुके थे। मैं नौकरी के कारण पुणे में रहता हूं। मेरी बहन विदेश में है। हम फोन करते थे, मिलने भी आते थे, लेकिन..."
वह रुक गया।
रिया चुपचाप सुनती रही।
रोहन ने कहा—
"पापा कहते थे कि अकेलापन घर में लोगों की कमी से नहीं होता। अकेलापन उस समय होता है जब आपको अपनी बात कहने वाला कोई न मिले और किसी की बात सुनने का मन भी न हो।"
रिया की आंखों से फिर आंसू बहने लगे।
रोहन बोला—
"लेकिन आपकी पोस्ट आने के बाद उनमें बदलाव आया था।"
रिया ने धीमे से पूछा—
"कैसा बदलाव?"
"वो सुबह उठकर फोन देखते थे। कभी-कभी कहते थे कि आज रिया ने कुछ लिखा या नहीं।"
रिया के होंठ कांपने लगे।
रोहन ने कहा—
"मैंने कई बार उन्हें छेड़ा भी था। कहा था कि पापा, आप तो इनके बहुत बड़े फैन हो।"
रिया ने पूछा—
"फिर उन्होंने क्या कहा?"
रोहन ने उत्तर दिया—
"उन्होंने कहा था— मैं फैन नहीं हूं। मैं बस इसकी जिंदगी का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा हूं, जिसके बारे में इसे शायद कभी पता नहीं चलेगा।"
रिया की सिसकियां तेज हो गईं।
अध्याय 12 : हर लाइक के पीछे एक कहानी थी
रोहन ने कहा—
"पापा आपकी पोस्ट पर जल्दी लाइक करने की कोशिश करते थे।"
रिया चुप थी।
"क्योंकि उन्हें लगता था कि इतने सारे लोगों में अगर कभी आपको सबसे पहले कोई प्रतिक्रिया दिखाई दे, तो शायद आपको अच्छा लगे।"
रिया का सिर घूम गया।
उसे याद आया—
कितनी बार उसने पोस्ट डालकर मोबाइल खोला था।
कितनी बार उसने सोचा था—
"पहला लाइक विनय जी का होगा।"
उसे क्या पता था कि दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति भी शायद उसी पोस्ट का इंतजार करता था।
रोहन ने कहा—
"पापा कहते थे कि आजकल सोशल मीडिया पर बहुत नफरत है। लोग कुछ भी लिख देते हैं। लेकिन मैं कोशिश करता हूं कि रिया को कम से कम मेरी तरफ से हमेशा एक सकारात्मक संकेत मिले।"
रिया अब रोते हुए मुस्कुरा दी।
वह व्यक्ति, जिसे वह कभी-कभी शक की नजर से देखती थी...
वह व्यक्ति जो वर्षों तक कुछ नहीं बोला...
वह बस उसे यह एहसास दिलाना चाहता था कि—
कोई है जो तुम्हारी बात पढ़ता है।
अध्याय 13 : इंदौर की यात्रा
फोन रखने के बाद रिया कई दिनों तक सामान्य नहीं हो पाई।
ऑफिस में बैठी होती तो अचानक विनय शर्मा याद आ जाते।
पोस्ट लिखती तो लगता जैसे कोई पढ़ने वाला कम हो गया।
मोबाइल पर नोटिफिकेशन आता तो कुछ क्षण के लिए उसे उम्मीद होती।
फिर याद आता—
अब वह नाम नहीं आएगा।
एक दिन उसने रोहन को फोन किया।
"मैं इंदौर आना चाहती हूं।"
रोहन ने कहा—
"आइए मैडम। पापा शायद खुश होते।"
कुछ दिनों बाद रिया ट्रेन से इंदौर पहुंची।
स्टेशन पर रोहन खड़ा था।
उसे देखकर रिया ने महसूस किया कि वह किसी अजनबी के बेटे से नहीं मिल रही।
जैसे किसी ऐसे व्यक्ति के परिवार से मिल रही हो जिसके बारे में वह बहुत कम जानती थी, लेकिन जिसे उसने वर्षों से अपने जीवन में महसूस किया था।
घर साधारण था।
छोटा सा।
साफ-सुथरा।
दीवार पर विनय शर्मा की तस्वीर लगी थी।
तस्वीर में वही मुस्कान थी।
रिया तस्वीर के सामने खड़ी रह गई।
उसने हाथ जोड़ दिए।
उसकी आंखें भर आईं।
वह धीरे से बोली—
"मुझे माफ कर दीजिए... मैंने आपको बहुत देर से पहचाना।"
अध्याय 14 : एक मोबाइल में बंद रिश्ता
रोहन उसे अपने पिता के कमरे में ले गया।
कमरे में एक कुर्सी थी।
मेज थी।
किताबें थीं।
एक पुराना चश्मा।
कुछ दवाइयां।
और एक मोबाइल।
रोहन ने कहा—
"इसमें पापा ने आपकी बहुत सारी चीजें सेव की हैं।"
रिया ने मोबाइल हाथ में लिया।
स्क्रीन खुली।
एक फोल्डर था।
नाम—
"रिया"
रिया की आंखें भर आईं।
उसने फोल्डर खोला।
उसमें उसकी पोस्ट के स्क्रीनशॉट थे।
सैकड़ों।
कुछ तस्वीरें।
कुछ कविताएं।
कुछ विचार।
एक पोस्ट के नीचे विनय शर्मा ने लिखा था—
"आज बहुत अकेलापन था। अच्छा हुआ रिया ने कुछ लिखा।"
दूसरी पोस्ट—
"आज इसकी पोस्ट पढ़कर सीमा याद आ गई। शायद सीमा होती तो उसे भी पसंद आती।"
रिया रुक गई।
सीमा शायद उनकी पत्नी थीं।
एक जगह लिखा था—
"लड़की मुझे नहीं जानती, लेकिन इसकी बातें कभी-कभी मुझे मेरी बेटी जैसी लगती हैं। भगवान इसे हमेशा खुश रखे।"
रिया की आंखों से आंसू मोबाइल स्क्रीन पर गिरने लगे।
वह कुर्सी पर बैठ गई।
उसने पहली बार महसूस किया—
किसी व्यक्ति को जानने के लिए उससे मिलना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी किसी के शब्दों में उसकी पूरी आत्मा छिपी होती है।
अध्याय 15 : डायरी का आखिरी पन्ना
रोहन ने एक पुरानी डायरी रिया को दी।
"पापा लिखते थे।"
रिया ने धीरे-धीरे पन्ने पलटे।
कुछ जगह दैनिक जीवन की बातें थीं।
दवाइयों की सूची।
बिजली बिल।
किसी पुराने मित्र का नंबर।
लेकिन बीच-बीच में रिया थी।
एक पन्ने पर लिखा था—
"आज रिया ने प्रेम पर लिखा। उम्र के साथ शायद प्रेम खत्म नहीं होता, सिर्फ उसका रूप बदल जाता है।"
दूसरे पन्ने पर—
"आज इसकी पोस्ट पर किसी ने बहुत गंदा कमेंट किया। लिखने का मन हुआ कि बेटी, ऐसे लोगों को जवाब मत देना। लेकिन फिर सोचा, मैं कौन हूं? बस लाइक कर दिया। शायद इसे समझ आए कि भीड़ में कोई अच्छा सोचने वाला भी बैठा है।"
रिया ने डायरी अपने सीने से लगा ली।
फिर वह अंतिम पन्नों तक पहुंची।
वहां लिखावट थोड़ी कांपती हुई थी।
शायद हाथ कमजोर हो चुके थे।
उसमें लिखा था—
"आजकल तबीयत ठीक नहीं रहती। आंखें जल्दी थक जाती हैं। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर एक दिन मैं इसकी पोस्ट पर लाइक न करूं तो शायद इसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आखिर मैं हूं ही कौन?
लेकिन फिर मन कहता है, अगर कभी इसे फर्क पड़ा तो शायद मेरी चुप्पी बेकार नहीं गई।"
रिया वहीं बैठ गई।
उसने डायरी को अपनी गोद में रखा।
और बहुत देर तक रोती रही।
वह सोच रही थी—
उन्हें फर्क पड़ने की चिंता थी।
और उसे तब पता चला कि फर्क कितना पड़ता है, जब वह इस दुनिया में नहीं रहे।
अध्याय 16 : क्या यह प्रेम था?
दिल्ली लौटने के बाद निधि ने एक रात उससे पूछा—
"रिया, एक बात पूछूं?"
"हां।"
"क्या तुम्हें उनसे प्यार हो गया था?"
रिया चुप रही।
यह सवाल उसने खुद से भी कई बार पूछा था।
क्या वह प्रेम था?
नहीं।
शायद नहीं।
क्योंकि प्रेम में व्यक्ति को पाने की इच्छा होती है।
वह उन्हें कभी पाना नहीं चाहती थी।
क्या वह दोस्ती थी?
शायद नहीं।
क्योंकि दोस्ती में बातचीत होती है।
उनके बीच तो कभी बातचीत ही नहीं हुई।
क्या वह पिता-पुत्री का रिश्ता था?
शायद आंशिक रूप से।
लेकिन वह भी पूरा उत्तर नहीं था।
फिर क्या था?
रिया ने निधि की तरफ देखा।
और कहा—
"मुझे नहीं पता।"
निधि ने कहा—
"तो नाम मत दो।"
रिया चुप रही।
निधि बोली—
"हर रिश्ते को नाम देना जरूरी नहीं है। कुछ रिश्ते सिर्फ महसूस करने के लिए होते हैं।"
रिया की आंखें भर आईं।
उसे विनय शर्मा की बात याद आई—
"कुछ रिश्तों के जवाब नहीं होते।"
अध्याय 17 : अंतिम पोस्ट
कुछ दिनों बाद रिया ने अपने सोशल मीडिया पेज पर एक लंबी पोस्ट लिखी।
उसने किसी का नाम नहीं लिया।
कोई तस्वीर नहीं लगाई।
बस लिखा—
"आज मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना चाहती हूं जिसे मैंने कभी देखा नहीं, कभी सुना नहीं और कभी ठीक से जाना भी नहीं।
वह व्यक्ति कई वर्षों तक मेरी हर बात के साथ मौजूद रहा। वह कभी मुझसे कुछ मांगने नहीं आया। उसने कभी मेरी निजी जिंदगी में प्रवेश करने की कोशिश नहीं की।
वह बस मेरी पोस्ट पर एक छोटा सा निशान छोड़ जाता था—एक लाइक।
पहले मुझे लगा कि यह सामान्य बात है। फिर यह आदत बन गई। और जब वह निशान आना बंद हुआ, तब मुझे पता चला कि आदतें भी रिश्ते होती हैं।
हम अक्सर सोचते हैं कि हमें प्यार करने वाला व्यक्ति वह होता है जो हमारे लिए बड़े-बड़े काम करे। लेकिन कभी-कभी कोई व्यक्ति सिर्फ हमारी बात सुनकर, हमारे शब्दों को पढ़कर और हमारी उपस्थिति को स्वीकार करके भी हमें बहुत कुछ दे जाता है।
अगर आपकी जिंदगी में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चुपचाप आपका साथ देता है, उसकी उपस्थिति को हल्के में मत लीजिए।
क्योंकि एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब आप अपनी स्क्रीन पर उसका नाम ढूंढते रह जाएं... और वह नाम कभी दिखाई न दे।"
पोस्ट डालने के बाद रिया ने मोबाइल रख दिया।
उसकी आंखें बंद थीं।
कुछ देर बाद उसने नोटिफिकेशन खोला।
हजारों लोगों ने पोस्ट लाइक की थी।
सैकड़ों कमेंट आए थे।
लोग अपनी कहानियां लिख रहे थे।
किसी ने लिखा—
"मेरे पिताजी भी अब नहीं हैं, आपकी कहानी पढ़कर याद आ गए।"
किसी ने लिखा—
"मेरी एक पुरानी दोस्त थी, अब बात नहीं होती लेकिन रोज मेरी पोस्ट देखती है। आज उसे फोन करूंगा।"
किसी ने लिखा—
"हम अक्सर लोगों की मौजूदगी को तब समझते हैं जब वे चले जाते हैं।"
रिया सब पढ़ती रही।
फिर उसने लाइक्स की सूची खोली।
वह जानती थी कि वहां कौन नहीं होगा।
फिर भी उसने देखा।
ऊपर।
नीचे।
बहुत नीचे तक।
फिर उसने स्क्रीन बंद कर दी।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
उसने धीरे से कहा—
"विनय जी, आज भी पहला लाइक आपका ही है।"
फिर उसकी आंखों से आंसू निकल आए।
"बस इस बार वह स्क्रीन पर नहीं... मेरे दिल पर है।"
उपसंहार : पहला लाइक
समय फिर आगे बढ़ गया।
रिया ने लिखना जारी रखा।
लेकिन अब उसके शब्दों में पहले से ज्यादा गहराई थी।
वह हर पोस्ट लिखने से पहले सोचती—
"पता नहीं इसे कौन पढ़ेगा?"
शायद कोई खुश व्यक्ति।
शायद कोई उदास लड़की।
शायद कोई अकेला बुजुर्ग।
शायद कोई ऐसा इंसान जिसे दुनिया में कोई समझ नहीं रहा।
और फिर वह लिखती।
पहले से ज्यादा जिम्मेदारी से।
पहले से ज्यादा प्रेम से।
क्योंकि अब उसे पता था—
शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते।
वे कभी-कभी किसी की जिंदगी का सहारा बन जाते हैं।
कभी किसी की सुबह।
कभी किसी की आदत।
कभी किसी के अकेलेपन की दवा।
और कभी—
किसी अनकहे रिश्ते की शुरुआत।
रिया आज भी जब कोई नई पोस्ट डालती है तो कुछ मिनट बाद अपना मोबाइल देखती है।
हजारों लाइक होते हैं।
सैकड़ों प्रतिक्रियाएं।
लेकिन उसकी नजर अनजाने में एक नाम खोजती है।
फिर उसे याद आता है—
वह नाम अब कभी नहीं आएगा।
पहले इस बात पर उसका दिल टूट जाता था।
अब वह मुस्कुरा देती है।
क्योंकि उसे लगता है कि कहीं न कहीं विनय शर्मा अब भी उसकी पोस्ट पढ़ रहे होंगे।
शायद इस बार लाइक करने के लिए उन्हें मोबाइल की जरूरत नहीं।
रिया ने एक दिन अपनी डायरी में लिखा—
"कुछ लोग हमारी जिंदगी में बिना दस्तक दिए आते हैं।
वे दरवाजे पर अपना नाम नहीं लिखते।
वे अधिकार नहीं जताते।
वे साथ चलने का वादा नहीं करते।
वे बस कहीं दूर खड़े होकर यह सुनिश्चित करते हैं कि जब हम पीछे मुड़कर देखें तो हमें लगे—कोई था।
और जब वे चले जाते हैं, तब हमें समझ आता है कि उनकी चुप्पी भी कितनी बड़ी बातचीत थी।"
डायरी बंद करते हुए रिया की आंखें नम थीं।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर उदासी नहीं थी।
एक अजीब सी शांति थी।
क्योंकि अब उसने उस रिश्ते को समझने की कोशिश करना छोड़ दिया था।
उसने उसे बस स्वीकार कर लिया था।
एक ऐसा रिश्ता—
जिसमें दो लोग कभी मिले नहीं।
कभी बात नहीं की।
कभी एक-दूसरे का हाथ नहीं पकड़ा।
कभी एक-दूसरे से कोई वादा नहीं किया।
फिर भी दोनों एक-दूसरे की जिंदगी का हिस्सा बन गए।
एक तरफ थी—
लाखों लोगों के बीच रहने वाली रिया।
दूसरी तरफ था—
एक शहर में अकेला रहने वाला विनय।
दोनों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी थी।
उम्र का अंतर था।
जीवन अलग था।
दुनिया अलग थी।
लेकिन दोनों को जोड़ने के लिए एक बहुत छोटी सी चीज काफी थी।
एक पोस्ट।
कुछ शब्द।
और उसके नीचे बना हुआ—
❤️
पहला लाइक।
शायद यही जिंदगी की सबसे अजीब और सबसे सुंदर बात है।
हम नहीं जानते कि हमारी एक छोटी सी मुस्कान किसके दिन को अच्छा बना रही है।
हम नहीं जानते कि हमारा एक संदेश किसके अकेलेपन को कम कर रहा है।
हम नहीं जानते कि हमारा एक "कैसे हो?" किसी व्यक्ति को कितना अपना महसूस करा सकता है।
और हम यह भी नहीं जानते कि हमारी जिंदगी में चुपचाप मौजूद कोई व्यक्ति हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण बन चुका है।
इसलिए शायद—
किसी की चुप उपस्थिति को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्योंकि आवाज करने वाले लोग तो याद रह ही जाते हैं।
लेकिन जो लोग बिना आवाज किए हमारे जीवन में अपना स्थान बना लेते हैं—
उनके जाने के बाद जो सन्नाटा होता है,
वह जिंदगी भर सुनाई देता है।
और कभी-कभी...
हम पूरी जिंदगी उस एक नाम को ढूंढते रह जाते हैं—
जो कभी हमारी हर खुशी के नीचे,
हर तस्वीर के नीचे,
हर शब्द के नीचे,
सबसे पहले लिखा होता था।
"Liked by Vinay Sharma."
रिया ने एक दिन अपने फोन की पुरानी नोटिफिकेशन देखीं।
वह वर्षों पुरानी तारीखों तक पहुंच गई।
एक पुरानी पोस्ट थी।
उसके नीचे नोटिफिकेशन लिखा था—
Vinay Sharma liked your post.
रिया बहुत देर तक उस स्क्रीन को देखती रही।
फिर उसने अपनी उंगली से उस नाम को हल्के से छुआ।
जैसे कोई दूर बैठे व्यक्ति का हाथ पकड़ना चाहती हो।
उसकी आंखों से आंसू निकले।
लेकिन उसने मोबाइल बंद नहीं किया।
वह मुस्कुराई।
और बहुत धीरे से कहा—
"धन्यवाद, विनय जी..."
कुछ सेकंड बाद उसने फिर कहा—
"मेरी हर पोस्ट पर आने के लिए नहीं..."
उसकी आवाज भर्रा गई।
"मेरी जिंदगी में बिना आए भी उसका हिस्सा बनने के लिए।"
बाहर शाम हो रही थी।
आसमान पर सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।
रिया बालकनी में खड़ी थी।
उसने एक तस्वीर खींची।
बहुत दिनों बाद।
और पोस्ट लिखी—
*"हर रिश्ता साथ चलने से नहीं बनता।
कुछ रिश्ते बस इतना करते हैं कि जब हम जिंदगी की भीड़ में खुद को अकेला महसूस करें,
तो कहीं से एक छोटा सा संकेत आ जाए—
मैं यहां हूं।"*
उसने पोस्ट डाल दी।
मोबाइल मेज पर रखा।
और आसमान की तरफ देखने लगी।
कुछ मिनट बाद मोबाइल पर नोटिफिकेशन की आवाज आई।
एक।
दो।
दस।
सैकड़ों।
हजारों।
लेकिन इस बार रिया ने तुरंत मोबाइल नहीं उठाया।
वह मुस्कुराती रही।
क्योंकि आज उसे किसी नाम का इंतजार नहीं था।
जिस व्यक्ति की उपस्थिति को वह ढूंढती थी, वह अब किसी लाइक में नहीं था।
वह उसकी यादों में था।
उसके शब्दों में था।
उसकी आंखों की नमी में था।
और शायद—
उसके हर नए पोस्ट के पीछे,
चुपचाप खड़ा था।
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते।
वे बस—
स्क्रीन से उतरकर यादों में चले जाते हैं।